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पाकिस्तान में कुर्सी पाने के लिए युद्ध जैसे हालात

By ओमकार चौधरी | Oct 30, 2016 |
nawaz
पाकिस्तान से लगती सरहद पर जैसे हालात इस समय हैं, वैसे कभी नहीं रहे। खासकर पीओके में भारतीय सेना द्वारा 28 सितंबर को की गई सजिर्कल स्ट्राइक के बाद से ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सेना कुंठा, अपमान और सदमे के मिले जुले भाव में युद्धविराम उल्लंघन के पिछले सारे कीर्तिमान ध्वस्त करने पर आमादा है। दोनों देशों के अमन पसंद नागरिक गहरे तनाव में हैं। युद्ध को लेकर आशंकाओं के बादल उनके दिल और दिमागों में घुमड़ रहे हैं। पाक रेंर्जस को अपनी इस गुस्ताखी का ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है, परंतु नुकसान भारत को भी उठाना पड़ा है। हमने भी सरहदों की रक्षा में तैनात बीएसएफ के कई जवान गंवा दिए हैं। पाकिस्तानी सेना लगातार भारत को उकसाने की कोशिश कर रही है। शुक्रवार रात में ठीक वैसी ही शर्मनाक घटना घटी, जैसी 2013 में हुई थी। तब पाक सेना सीमा पर तैनात लांस नायक हेमराज का सिर काटकर ले गई थी। अब बीएसएफ के जवान मनदीप सिंह के शव को क्षत-विक्षत किया गया है। 2013 में भी सेना ने उसका माकूल जवाब दिया था और इस बार भी ऐलान किया है कि वह इस बर्बरता का हिसाब चुकता करेगी। 
 
नियंत्रण रेखा पर पाक की तरफ से युद्धविराम का उल्लंघन कोई नई बात नहीं है। सर्दियां शुरू होने से ठीक पहले आतंकवादियों को घुसपैठ कराने की मंशा से पाकिस्तानी सेना इस तरह के हथकंडे बरसों से आजमाती आ रही है। इस बार अंतर यह आ गया है कि इसकी तीव्रता कई गुना बढ़ गई है। पहले किसी एक या दो सेक्टर में इस तरह की वारदातें होती थीं। इस बार एक साथ दस-दस क्षेत्रों में भारतीय चौकियों और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है। इसकी दो वजह साफ तौर पर समझ में आ रही हैं। उरी में आतंकी हमले के बाद सेना ने जिस तरह पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर कई आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करते हुए चालीस से अधिक आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा है, उसने पाक सरकार और सेना को भीतर तक हिलाकर रख दिया है। सीधे तौर पर वहां की सेना, सरकार, मीडिया और दूसरी जमातें भले ही सजिर्कल स्ट्राइक की घटना से इनकार कर रही हैं। पर वस्तुस्थिति यह है कि वो अपमान का घूंट पीकर रह गए हैं। अगर इसे स्वीकार करें तो इससे दो चीजें सिद्ध हो जाएंगी। पहली यह कि वहां आतंकी ठिकाने हैं। दूसरी यह कि पाक सेना अपनी सरहदों की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम रही हैं। पहले अमेरिकी सेना ने पाक में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारा उतारा था। अब भारतीय फौज ने घुसकर मारा है। 
 
दूसरी अहम वजह यह है कि पाक सेना लगातार गोले बरसाकर सरहद पर युद्ध जैसे हालात बनाए रखना चाहती है। उसका पहला मकसद है कि बर्फबारी से पहले उन दो सौ के करीब आतंकवादियों को भारतीय सीमा में घुसपैठ करा दिया जाए, जिन्हें प्रशिक्षित कर यहां खून खराबे के लिए तैयार किया गया है। दूसरा मकसद पाक सेना प्रमुख राहिल शरीफ के सेवा विस्तार से जुड़ा है। 28 नवंबर को वह रिटायर होने जा रहे हैं। भले ही रावलपिंडी का सेना मुख्यालय यह कह रहा हो कि राहिल तय समय पर रिटायर होने की तैयारी कर रहे हैं, हकीकत यह है कि वे सरहद पर युद्ध जैसे हालात बनाकर पीएम नवाज शरीफ के ऊपर इस कदर दबाव बना देना चाहते हैं कि वे सेवा विस्तार को स्वीकृति प्रदान कर दें। नवाज शरीफ अभी तक इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। वे सेना प्रमुख को सेवा विस्तार के मूड में नहीं हैं। खबरें तो यहां तक आ रही हैं कि वे लेफ्टिनेंट जनरल जुबैर हयात, लेफ्टिनेंट इश्फाक नदीम अहमद, लेफ्टिनेंट जावेद इकबाल रामड़े और लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा में से किसी को सेना प्रमुख बनाने का फैसला लेने वाले हैं। राहिल शरीफ को यह नागवार गुजर रहा है कि सेवा विस्तार तो छोड़िए, पीएम नए सेना प्रमुख के नाम पर उनसे सलाह भी नहीं ले रहे हैं। 
 
पाकिस्तान के इस समय जो अंदरूनी हालात हैं, उन्हें समझना जरूरी है, क्योंकि सरहद पर लगातार गोलाबारी के पीछे की एक बड़ी वजह दोनों शरीफों नवाज और राहिल के बीच पसरा तनाव भी है। नवाज शरीफ 2013 में प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने ही राहिल शरीफ को सेना प्रमुख नियुक्त किया था। वह सैन्य परिवार से आते हैं। उनके दो करीबी 1965 और 1971 की जंग में मारे जा चुके हैं। राहिल शरीफ इसी कारण भीतर ही भीतर भारत से नफरत करते हैं। किसी भी सूरत में वह भारत से वार्ता और शांति के पक्ष में नहीं हैं। जबकि नवाज शरीफ शांति और वार्ता के पक्षधर रहे हैं। वे नरेंद्र मोदी के बुलावे पर उनके शपथ ग्रहण में भी शरीक हुए। मोदी उनकी नातिन के निकाह और उनके जन्मदिन के मौके पर काबुल से दिल्ली लौटते हुए कुछ समय के लिए लाहौर भी रुके थे। नवाज व मोदी के बीच बढ़ती समझबूझ राहिल शरीफ ही नहीं, वहां की आतंकी जमातों को भी नागवार गुजरी। यही वजह रही कि लाहौर यात्रा के कुछ ही दिन बाद पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले को अंजाम दिया गया। खुद नवाज शरीफ इससे हतप्रभ थे। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को फोन पर अफसोस जताते हुए इसके दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया। वहां से जांच दल भेजा गया, जिसे भारत ने इजाजत दी, परंतु राहिल शरीफ के अड़ंगे के चलते जांच का कोई नतीजा सामने नहीं आया। 
 
इस बीच दो घटनाएं और घटीं। जुलाई में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिज्बुल का पोस्टर ब्वाय और कुख्यात आतंकी बुरहान वानी मारा गया। पाक सेना, आईएसआई और आतंकी जमातों के साथ-साथ अलगाववादियों को घाटी को सुलगाने का बहाना मिल गया। उधर, पनामा पेपर लीक मामले में नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। इमरान खान सहित दूसरे विरोधी दलों ने नवाज शरीफ पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। नवाज को नोटिस जारी कर शीर्ष कोर्ट ने हलफनामा देने को कहा। राहिल शरीफ को बैठे बिठाए नवाज पर दबाव बनाने का औजार मिल गया। नवाज शरीफ ने जब देखा कि वे तीन तरफ से घिर गए हैं तो उन्होंने भी बुरहान वानी को शहीद बताकर भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने जो भाषण पढ़ा, उसके बारे में भी यही कहा जा रहा है कि वह सेना प्रमुख ने ड्राफ्ट किया था। इस समय हालत यह है कि अपना-अपना वजूद बचाने के लिए दोनों शरीफ पूरी जान लगाए हुए हैं। राहिल शरीफ भारत के साथ नवाज की वार्ता की कोशिशों को पलीता लगा चुके हैं। सरहद पर युद्धविराम का उल्लंघन और उकसावे वाली गोलाबारी कराकर वे युद्ध जैसे हालात बनाने में भी सफल हैं ताकि नवाज घबराकर उनके सेवा विस्तार पर मुहर लगा दें। नवाज को अगले कुछ दिनों में पनामा पेपर लीक मामले में अदालती कार्रवाई का सामना भी करना है। इमरान खान के सर्मथक दो नवंबर को इस्लामाबाद में प्रदर्शन का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि दोनों शरीफ अपनी-अपनी कुर्सी बचाने में सफल होते हैं या नहीं?
 
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