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उरी हमला: मनोबल सबसे बड़ा प्रश्न

By डा. प्रभात ओझा | Sep 20, 2016 |
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देश के रहनुमा भलीभांति जानते हैं कि सीमाओं की रक्षा के मामले में आम लोगों का मनोबल सेना के प्रदर्शन पर निर्भर है। वही सेना बार-बार मुश्किल में आए तो हालात का अंदाज लगाया जा सकता है। राष्ट्रपति तक दोषियों को सजा देने की बात कह रहे हों, तो उसका मतलब साफ है। टी.बी में पहले से ही चल रही अशांति के बीच उरी के सैन्य ठिकाने पर आतंकवादी हमला पाकिस्तानी करतूत का ही नतीजा है। जैश के कैंप से आतंकियों की ट्रेनिंग और उनके पास मिलने वाले पाकिस्तानी हथियार से बहुत कुछ साफ होता रहा है। इस ताजा हमले की भी संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनियाभर में निंदा हुई है। 
 
सवाल यह है कि आतंक की निंदा करने भर से क्या भारत पर लगा घाव भर जाएगा। हमारे देश के आम लोगों के जेहन में एक सवाल कौंध रहा है कि क्या हम इस तरह के हमलों का कभी जवाब दे पाएंगे। सबसे बड़ी बात है कि देश की सीमाओं पर तैनात बहादुर सैनिक बलिदान तक सीमित होने को मजबूर से क्यों लगते हैं। पठानकोट पर हुआ हमला आठ सैनिकों की शहादत का सबब बना तो इस बार 17 सैनिक शहीद हो गए। लगता है कि हमारी सरकार के सब्र की सीमा अब खत्म हो रही है। तभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साफ कहा है कि इस हमले के पीछे जो भी लोग हैं, उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। पीएम का सख्त रुख समझ में आता है। ऐसा नहीं कि आतंकवाद कोई नई समस्या है। फिर भी देश में विपक्ष तक को यह कहने का मौका मिल गया है कि ऐसा हमला तो पिछले दो दशक में नहीं हुआ था।
 
सरकार को हालात का अंदाजा खूब है। वह कभी नहीं चाहती कि विपक्ष उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा के हालात पर आरोप मढ़े। सच यह है कि मुश्किल दोहरा है। जम्मू कश्मीर के अंदर के हालात पर पाकिस्तान इसे मानवाधिकार का मसला बताता रहा है तो सीधे कश्मीर की कथित आजादी से जोड़ता है। बाहरी हमलों में भी उसी के हाथ होने के पुख्ता सुबूत मिलते रहे हैं। अंदर के हालात और सीमा पार से हमलों के तार जुड़े हुए हैं। इसकी पुष्टि सूबे में कई नेताओं को बाहर से मिलने वाली आर्थिक मदद से भी हो जाती है।
 
 हर जुम्मे को सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले लड़कों में से कई ने इस साजिश का खुलासा किया कि उन्हें इस काम के लिए पैसे मिलते हैं। तय है कि ये पैसे देश के अंदर से नहीं दिए जाते। फिर भी सुरक्षा बलों की कार्रवाई के चलते भीड़ में शामिल लोग भी अपंगता की सीमा तक पहुंचे। कहा गया कि इनमें से बहुतेरे निदरेष हैं। जो भी हो, कम से कम अलगाव अथवा अधिक अधिकारों की मांग करने वाले हुर्रियत नेताओं को तो देशभक्ति का पाठ नहीं सुहाता, इसलिए इस महीने की 11 तारीख को गृहमंत्री राजनाथ सिंह का एक बयान आया। अजीब बात है कि बयान को मीडिया में अनुकूल जगह नहीं मिली।
 
गृहमंत्री ने सुरक्षा बलों से कहा कि कश्मीर घाटी में खराब हालात के जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करें। शायद लगा होगा कि एक गृहमंत्री को तो यह करना ही होता है। बावजूद इसके ध्यान देना होगा कि यह सामान्य बयान की तरह नहीं था। गृहमंत्री का बयान उस समय आया, जब वह संसद में मौजूद करीब सभी दलों के प्रतिनिधियों के साथ राज्य के दौरे से लौटे थे । सख्ती के संकेत उन्होंने र्शीनगर में ही दे दिए थे। असल में अब उस संकेत के मद्देनजर कठोर कार्रवाई शुरू होने का दौर था। गृहमंत्री का यह बयान बहुत सोचने समझने के बाद आया होगा। पहली बार भाजपा जम्मू कश्मीर की सरकार में भागीदार बनी। 
 
यह पहली बार नहीं हुआ कि केन्द्र में बैठी पार्टी राज्य में भी सत्तासीन हुई। पहली बार तो यह हुआ कि लम्बे समय से कश्मीर को विशेष दर्जा और वहां के हालात, दोनों से रूबरू होने का मौका ऐसी पार्टी के सामने था, जो इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों को कठघरे में खड़ा करती रही। लोगों के बीच संशय का होना स्वाभाविक था कि भाजपा राज्य में पीडीपी जैसी पार्टी के साथ खड़ी होकर इन मुद्दों पर क्या कर लेगी। संशय मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतकाल के कारण उनकी बेटी के मुख्यमंत्री बनने पर और अधिक बढ़ गया। मोटे तौर पर सूबे में अमन चैन और राष्ट्रीय हितों पर वालिद और बेटी के ख्यालात जुदा नहीं हो सकते। बतौर सीएम उन्हें एक ही तरह के काम करने होते अथवा करने चाहिए। फिर भी सभी जानते हैं कि महबूबा अपनी पार्टी के सर्मथकों के चलते केन्द्र के साथ रिश्तों के मामले में मुफ्ती साहब से थोड़ा हटकर हैं। 
 
केन्द्र ने महबूबा को लेकर अपनी स्थिति सख्त कर ली। इसी के साथ तय सा हो गया कि राज्य की सरकार के जो भी हालात हो, राज्य के अंदर अशांति और अधिक समय तक चलने नहीं दी जा सकती। अशांति फैलाने वालों के पाकिस्तान में बैठे आकाओं को यह रास नहीं आता कि घाटी के हालात सुधारने की कोशिश परवान चढ़े, इसीलिए वह बाहर से भी हमले कराते रहते हैं। हमला छोटा है अथवा बड़ा, हमारे शहीदों की संख्या से तय नहीं किया जाना चाहिए। देश के रहनुमा इसे भली भांति जानते हैं कि सीमाओं की रक्षा के मामले में आम लोगों का मनोबल सेना के प्रदर्शन पर निर्भर हुआ करता है। 
 
खुद वही सेना बार-बार मुश्किल में आए तो हालात का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री से लेकर तीनों सेनाओं के प्रमुख राष्ट्रपति तक दोषियों को सजा देने की बात कह रहे हों, तो उसका मतलब साफ है। देश के रक्षा मंत्री और थल सेनाध्यक्ष ने मौके पर जाकर हालात का जायजा लिया, तो अगली ही सुबह गृहमंत्री ने उच्च स्तरीय बैठक बलाई। बैठक की जानकारी पीएम तक पहुंचाने की प्रकिया के बाद देश को इंतजार है किसी अगले कठोर कदम की। दुनिया के हालात आम तौर पर सीधे युद्ध वाले नहीं रहे। फिर भी आतंक के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के उदाहरण बहुत से हैं। यह कठोर कदम निश्चित ही हमारी सेनाओं के साथ आमजन का मनोबल बढ़ाने वाला होगा, ऐसी उम्मीद है।
 
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