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समाजवादी दंगलः एक महिला के कारण मचा है सपा में 'घमासान'

By Satvir Kataria | Dec 30, 2016 |
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देश में राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। और सत्तारुढ़ दल समाजवादी पार्टी में सीटों के बंटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है। आगामी विधानसभा चुनावों के बाबत बीते 32 घंटे पार्टी के तीन मुखियाओं ने तीन अलग-अलग उम्मीदवारों की सूची जारी की है।
 
पहले एक मुखिया ने सूची जारी की तो दूसरे ने उसके ऊपर अपनी सूची जारी कर दी। जिसमें पुराने मुखिया के ओर से प्रस्तावित नामों के ऊपर अपने नामों को तरजीह दी। जबकि दूसरे के नामों की अनदेखी की।
 
ऐसे में अंतर्कलह गहराती जा रही है। इसके कारण के तौर पर फिलहाल मुलायम सिंह यादव की सूची के 31 नाम बताए जा रहे हैं। जिनपर अखिलेश असहमत हैं।
 
पर वास्तविकता यह है कि अखिलेश की नाराजगी 31 नामों पर नहीं, बल्कि कुछ नामों पर है, जिनमें सबसे प्रमुख नाम अपर्णा बिस्ट यादव का है।
 
अपर्णा बिस्ट यादव यानी अखिलेश यादव की सौतेले भाई की पत्नी। प्रतीक यादव, मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के बेटे हैं। मसला यह है कि अंदरखाने अपर्णा यादव को अखिलेश यादव के बरक्स खड़ा करने की कवायद चल रही है।
 
अब सवाल आता है कि ऐसा क्यों? अखिलेश यादव तो बेहतर काम कर रहे हैं। फिर ऐसे में सपा या मुलायम सिंह यादव को अखिलेश के बरक्स किसी और नेता को खड़े करने की क्या जरूरत आन पड़ी।
 
इसका जवाब यह कि अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव में मतभेद। असल में अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव से खफा हैं।
 
कारण वह खुद बताते हैं- "राजनीतिक दलाल"। वह कई मर्तबे इस शब्द को रैलियों में दोहराते रहे हैं। रामगोपाल यादव ने कल ही कहा था कि कुछ राजनीतिक दलाल अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री नहीं बनने देना चाहते। वह आज मीडिया से बातचीत के दौरान कह रहे थे कि एक आदमी के कहने पर अखिलेश को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था।
 
अर्से तक चुप्पी साधने के बाद जब यह शब्द संबोधित किया गया तब अमर सिंह ने रुआंसी शक्ल में इसका जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अखिलेश और रामगोपाल इस तरह के शब्द प्रयोग कर रहे हैं, इससे उन्हें दुख हुआ।
 
इस बिना नाम लिए चल रही जंग में अंदर की बात यह मानी जाती है कि मुलायम सिंह यादव का अमर सिंह को लेकर एक अनोखे किस्म का "प्यार" है। जो अखिलेश यादव को नाकाबिले बर्दाश्त है।
 
आज से नहीं। साल 2009 से। जब अखिलेश की मर्जी के खिलाफ डिंपल यादव को उप-लोकसभा चुनावों में खड़ा किया गया और उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार झेलनी पड़ी।
 
आपको याद होगा कि इस पराजय के तुरंत बाद यादव परिवार में घमासान मचा। इसमें अखिलेश के पीछे उनके दोनों चाचा उनके साथ थे। तब मुलायम को मजबूर होकर सपा में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले अमर सिंह को पार्टी से निष्काषित करना पड़ा था।
 
क्योंकि अखिलेश नहीं चाहते थे कि आगे से अमर सिंह सपा की अंदरूनी राजनीति और उनके परिवार में कोई "बाहरी" दखलअंदाजी करे। अंततः अखिलेश इसमें असफल रहे और कुछ महीने पहले मुलायम सिंह यादव ने अमर ‌सिंह को वापस पार्टी में शामिल कर लिया।
 
और यहां से शुरू हुई अखिलेश-मुलायम में लड़ाई
अमर को वापस लाने के पीछे मुलायम सिंह का अनोखा "प्यार" बताया गया। लेकिन अखिलेश ने इस अनोखे "प्यार" को राजनीतिक दबाव करार दिया।
 
यहां से कवायद शुरू हुई कि अखिलेश यादव के बरक्स किसी और को खड़ा किया जाए। लेकिन प्रदेश में अखिलेश यादव के कद का सपा में कोई दूसरा नेता है नहीं।
 
अखिलेश साफ-सुथरी छवि के हैं। उत्तर प्रदेश में पांच साल मुख्यमंत्री रहे हैं। मुलायम सिंह यादव के अलावा पार्टी के दूसरे नेता अखिलेश के बरक्‍स खड़े होने में अक्षम हैं।
 
ऐसे में मुलायम खेमा को एक नया चेहरा चाहिए था, साफ-सुथरा। लेकिन कोई मिल नहीं रहा था। फिर विचार किया गया मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता से हुए बेटे प्रतीक यादव के नाम पर।
 
पर प्रतीक ने राजनीति में आने के प्रति अनिच्छा दिखाई। वह बॉडी बिल्डर और बिजनसमैन हैं। फिर परेशानी खड़ी हो गई। अंततः मुलायम खेमा एक नाम ढूंढ निकाला। वह नाम है प्रतीक की पत्नी अपर्णा बिष्ट यादव।
 
अब मुलायम खेमा उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ाना चाहता है। और जब अखिलेश समर्थक चाचा रामगोपाल यादव यह कहते हैं कि राजनीतिक दलाल अखिलेश यादव को सीएम नहीं बनने देना चाहते, तो उनका इशारा इसी ओर होता है।
 
हालिया मुलायम की ओर से जारी की सूची में अपर्णा का नाम उम्मीदवार के तौर पर रखा गया था। जबकि अखिलेश की ओर से जारी की गई कथ‌ित सूची से अपर्णा का नाम गायब था।
 
अपर्णा की शादी प्रतीक से दिसंबर 2011 में हुई। लेकिन उनकी मुलाकात प्रतीक से साल 2007 में हुई थी। इसके बाद अपर्णा ने प्रतीक से लांग डिस्टेंस रिलेशनशिप बरकरार रखी, जब वह लीड्स यूनिवसिर्टी इंग्लैंड में पढ़ने चले गए।
 
टाइम्स ऑफ इंडिया के लखनऊ के ब्यूरो चीफ रहे अरविंद सिंह बिस्ट की बेटी अपर्णा की शुरुआती दिनों से ही राजनीतिक महत्वकांक्षाएं रही हैं।
 
लेकिन पति से एकदम उलट प्रतीक से शादी के बाद अपर्णा पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हो गईं। उन्होंने एनजीओ शुरू किए। समाजसेवा में तत्‍पर हो गईं। निभर्या डॉक्यूमेंट्री विवाद के वक्त उसके प्रदर्शन पर खुला विरोध कर रही थीं।
 
नरेद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का उन्होंने खुला समर्थन किया। यहां वहां जाकर खुद झाड़ू लगाई। अब उनके नाम पर विवाद है। मुलायम खेमा उन्हें विधानसभा चुनाव में खड़ा करना चाहता है। ज‌बकि दूसरी ओर अखिलेश उन्हें उम्मीदवार बनने के खिलाफ हैं।
 
अंदरखाने यह भी चर्चा है कि अब अखिलेश भी इसका काट निकालने में जुट गए हैं। वह डिंपल को लोकसभा से निकालकर विधानसभा लाने की तैयारी कर रहे हैं।
 
ऐसा होता है तो वह दिन दूर नहीं जब समाजवादी पार्टी का विभाजन हो जाएगा। सभी को इंतजार है चुनावों की घोषणा का जो संभवतः जनवरी के पहले सप्ताह में हो जाएगी और चुनाव फरवरी में होंगे। क्योंकि मार्च में विभिन्न बोर्डों की परीक्षाएं हैं।
 
(नोटः इस लेख से हरिभूमि.कॉम का कोई लेना-देना नहीं है। यह विचार स्वतंत्र राजनीतिक चिंतक सतवीर कटारिया के हैं, इसे हमने अपने यहां पर जगह दी है।)
 
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