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BLOG:सर्जिकल स्ट्राइक की सर्जरी

By कुमार प्रशांत | Nov 04, 2016 |
surgical
देश में शहादत का मेला लगा हुआ है! दो तरह की शहादत है सरकारी और गैर सरकारी! सरकारी योजना के तहत आप शहीद होते हैं तो उसे देश पर कुर्बान होना कहते हैं और आपकी जग विदाई का मेला बड़ा लगता है। आपका सम्मान वगैरह भी ऊंचे दर्जे का होता है और ऊंचे लोग आंसू बहाते हैं। ऊंचे लोग ऊंची पसंद! इसलिए तो कोई नहीं पूछता है कि हमारे इतने सारे जवान शहीद क्यों हो रहे हैं। शहादत की तैयारी रखना फौज का कर्तव्य है लेकिन किसी शहादत की नौबत न आए यह सरकार का कर्तव्य है बल्कि मैं कहूंगा कि सरकार होती ही इसलिए है। जो सीमा पर या सीमा के भीतर अपने लोगों को मारे जाने से रोक न सके वह सरकार होने लायक नहीं है। 
 
अब गैर सरकारी शहीदों की बात देखें। सरकार की बात न मानते हुए जब आप अपने मन से शहीद होने लगते हैं तो आप गैर सरकारी शहीद कहे जाते हैं। जैसे सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल! वे गैर सरकारी शहीद हो गये। इससे सरकार के मुंह का स्वाद खराब होने लगता है। टेढ़े-मेढ़े सवाल खड़े होने लगते हैं। एक नहीं, हजारों सवाल! कभी सेना प्रमुख रहे और अब दूसरे दर्जे के सरकारी मंत्री बने वीके सिंह सवाल उठाते हैं कि सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल की मानसिक स्थिति का पता लगाया जाना चाहिए, वे यह भी कहते हैं कि ये सैनिक लोग दो चार दस रुपयों के लिए रोते हैं। क्या सिंह साहब को याद नहीं आता है कि अपने जन्म की तारीख में सुधार कर नौकरी के चंद महीने बढ़वाने; और दो चार दस रुपयों का बैंक बैलेंस बढ़ाने का अदालत से लेकर प्रेस तक का उनका वह नाटक कितना ओछा था! तब उनकी मानसिक अवस्था की जांच करवाने की बात किसी ने की थी क्या? आज वे अपने ही सिपाहियों की मांग और उनकी निराशा का माखौल उड़ा कर उन्हें अपमानित कर रहे हैं। 
 
कोई यह नहीं पूछ रहा है और न कोई बता ही रहा है कि अचानक यह क्या हुआ है पाकिस्तान सीमा पर लगातार हमले कर रहा है? सर्जिकल स्ट्राइक तो हमने की थी न? फिर हम पर इतने सर्जिकल स्ट्राइक लगातार क्यों हो रहे हैं? हमारे जवान मर रहे हैं, नागरिक मर रहे हैं। सीमा का पूरा नागरिक जीवन छिन्न-भिन्न हो रहा है। शहीदों का सम्मान करने से वे जिंदा नहीं होते बल्कि किसी का, पूरे परिवार का जीवन बिखर जाता है। और नागरिकों की शहादत का क्या? उनका सम्मान तो दूर उनकी तो चर्चा भी नहीं होती। 
 
कोई सरकार का यह कह कर बचाव करे कि सीमा पर पाकिस्तान है ही बड़ा बदमाश देश तो मैं कबूल कर लूंगा लेकिन यह जरूर पूछूंगा कि पाकिस्तान आज हमारी सीमा पर कुकुरमुत्ते की तरह पैदा नहीं हुआ है और न वह कल तक शरीफ था और आज बदमाश हो गया है। वह हमारी आजादी के साथ ही सीमा पर आ गया था और जब से आया है, तब से बदमाशी ही कर रहा है। तो क्या करें? पड़ोसी बदल लें? यहां तो ऐसे लोग हैं जो राष्ट्रपिता और राष्ट्रगान बदलने को भी तैयार बैठे हैं।
 
उनकी चले तो तिरंगा भी बदल लें लेकिन इन बहादुरों को पता है कि नहीं कि आप देश बदल लो, बाप बदल लो लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते। तो फिर रास्ते दो ही बचते हैं- आप हमेशा दो लड़ती बिल्लियों की तरह रहें या फिर दोनों सभ्यता से साथ रहने का तरीका खोजें! सीमा के उस पार पड़ोसी की सभ्यता की खेती कम ही होती है, तो पैदावार भी जरा कम ही होती है, सो वह कमी भी हमें ही पूरी करनी पड़ती है। आजादी के बाद से भारत की हर सरकार यही करती आई है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भी! 
 
नरेंद्र मोदी ने भी ऐसा किया। भारत का दूसरा कोई प्रधानमंत्री नहीं है कि जिसने अपने प्रधानमंत्री बनने की गवाही देने के लिए पाकिस्तान को आमंत्रित किया हो। ऐसा करने वाला भी दूसरा कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं है कि जिसने जन्मदिन के समारोह में शिरकत करने के लिए अपना हवाई जहाज पाकिस्तान मोड़ लिया हो! विदेशी सम्मेलनों में यहां-वहां पकड़ कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री, सुरक्षा सलाहकार आदि से बातचीत की जितनी पहल मोदी सरकार ने की, उतनी तो किसी ने नहीं की! पूरी सरकार ने नौकरशाही ने और कलमघिस्सू पत्रकारों व विशेषज्ञों ने बाग-बाग हो कर कहा था कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह सब मास्टरस्ट्रोक है! फिर क्या हुआ? गुब्बारे की हवा निकल गई! साबित तो यही हुआ न कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति बच्चों का वह खेल नहीं है जो लगातार विदेश जाने, जाते रहने, जहां गये वहीं नाचने या बाजा बजाने, चुटकुलेबाजी करने या चौराहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने से साधी जा सकती है।
 
साबित यह भी हुआ कि विदेशी राजप्रमुखों को अपने यहां बुलाने, उन्हें बेहद तामझाम के साथ अपना वैभव दिखाने, नदी किनारे झूला झुलाने, अपने लॉन में बिठा कर, अपने हाथों चाय बना कर पिलाने आदि से अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदली नहीं जा सकती है, और न विदेशी सत्ताधीशों को उनके पहले नाम से पुकारने से रिश्ते पारिवारिक बनते हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति बड़ा बेरहम खेल है जिसे न भांप सकने के कारण जवाहरलाल नेहरू को इंग्लैंड, अमरीका और चीन ने बार-बार छला और आखिर विफल बना कर छोड़ा, जिसे न समझ सकने के कारण आज नरेंद्र मोदी का भारत, संसार में सबसे अलग-थलग पड़ गया है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान को सभी हाथोहाथ ले रहे हैं। वह तो हमेशा से महाशक्तियों के स्वार्थ का खिलौना रहा है। पाकिस्तान को यही रास भी आता है। सेना से बार-बार पिटा पाकिस्तानी लोकतंत्र महाशक्तियों में पनाह खोजता रहा है और वे उसे निचोड़ती रही हैं। अभी यह मौका चीन को मिला है। 
 
लेकिन क्या हम पाकिस्तानी आईने में अपना चेहरा देख कर खुश हो सकते हैं? सर्जिकल स्ट्राइक भारत की जरूरत थी और उसने वह किया। एक-दूसरे से परेशान सभी पड़ोसी ऐसा करते हैं। भारत ने भी ऐसा एकाधिक बार किया है, पाकिस्तान ने भी। लेकिन जो काम नहीं करते हैं और जो नहीं किया जाना चाहिए, वह है उसका छिछोरा प्रचार! युद्ध में विजय का राजनीतिक लाभ उठाना भी क्षम्य है लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक तो वह छिपा खेल है जिसके छिपे रहने में ही उसकी सफलता है। इसमें दुश्मन मार भी खाए लेकिन उफ भी न कर सके, तो बात बनती है। यह दुश्मन को अपमानित करने वाला खेल है। बात पोशीदा रहती है तो आप अपमान को पी जाते हैं। अपनी मरहम-पट्टी कर लेते हैं। जब बात खुल जाती है तब बात आन की बन जाती है। समझदारी इसी में मानी जाती है न कि आप बिल्ली को घेर कर मारो भी लेकिन उसके निकल भागने को एक खिड़की खुली छोड़ भी दो।
 
पाकिस्तान की तरफ से लगातार हो रही घुसपैठ, सीजफायर का उल्लंघनए गोली-बारी आदि सब इसलिए है कि हमने इस बिल्ली के लिए कोई खिड़की खुली नहीं छोड़ी! सत्ता के लोभ में की गई यह अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक भूल है जिसकी कीमत हमें हर मोर्चे पर चुकानी पड़ रही है। अब रास्ते दो ही हैं- जितनी जल्दी और जिसकी भी पहल से हो, दोनों देश बातचीत की मेज पर पहुंचें। बिल्लियों की इस लड़ाई में बंदर कौन है, यह समझना बहुत जरूरी है। इसलिए भारतीय कूटनीति की सफलता इसमें होगी कि हम पाकिस्तान को सामने बैठने के लिए मजबूर कर दें। दूसरा रास्ता है सीधा युद्ध जो कभी भी, कोई रास्ता नहीं बनाता है।
 
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