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शांति उन्मादियों से रहें सचेत

By अवधेश कुमार | Oct 04, 2016 |
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हमारे देश में युद्धोन्मादी तो नहीं हैं, लेकिन शांति उन्मादी और वार्ता उन्मादी विद्यमान हैं। इनमें कुछ इस समय यह नहीं चाहते कि सरकार को भारत पाक संबंधों को एक सही मोड़ देने या इसमें आवश्यक पैराडाइम शिफ्ट का र्शेय मिले। उनसे पूछा जाना चाहिए कि बातचीत क्यों और किससे हो?
 
एक ओर देश में नए सिरे से आत्मविश्वास और उम्मीद का माहौल कायम हुआ कि देर से ही सही भारत ने अपनी पाकिस्तान नीति को भावुकता से परे हटकर व्यावहारिकता के धरातल पर खड़ा किया है तो दूसरी ओर फिर कुछ शांति और बातचीत के उन्मादी खड़े हो रहे हैं। सर्जिकल ऑपरेशन या लक्षित कार्रवाई में सफलता से यह साबित हुआ है कि आतंकवादी हम पर हमला करें उसके पहले ही उनका काम तमाम किया जा सकता है और यह सीमा पार आतंकवाद का एकमात्र उपयुक्त जवाब है। अगर दुनिया के स्तर पर इसकी प्रतिध्वनि सुनें तो एक देश ने भी अभी तक भारत का विरोध नहीं किया है बल्कि अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों ने तो भारत की कार्रवाई का खुलकर सर्मथन किया है।
 
सर्मथकों की संख्या ज्यादा है, लेकिन सभी इन दोनों की तरह खुलकर नहीं बोल सकते। फिर अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को कहा जा रहा है कि वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करे। रूस यही कह रहा है। चीन ने भी भारत की कार्रवाई का विरोध नहीं किया है तो यह है दुनिया की प्रतिक्रिया, क्योंकि दुनिया को मालूम है कि भारत सीमा पार आतंकवाद से पीड़ित देश है और अभी तक उसने काफी संयम से काम लिया है, किंतु आतंकवादी हमलों के विरुद्ध अनवरत संयम का अर्थ है लगातार लहूलुहान होते रहना, इसलिए विश्व समुदाय के बहुमत ने इसे आतंकवाद के विरुद्ध स्वाभाविक अपरिहार्य कार्रवाई माना है।
 
दूसरी ओर हमारे ही देश में आम सर्मथन के बीच छोटी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनको यह कार्रवाई पता नहीं पच रही है या नहीं, वे दोनों देशों के बीच बातचीत की वकालत करने लगे हैं। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी बातचीत के पहले बड़े पैरोकार बनकर उभरे हैं। वे कह रहे हैं कि भारत को कूटनीतिक और राजनीतिक कदम बढ़ाना चाहिए, एक समझौते पर पहुंचना चाहिए। हमारे देश में युद्धोन्मादी तो नहीं हैं, लेकिन शांति उन्मादी एवं वार्ता उन्मादी लंबे समय से विद्यमान हैं।
 
इनमें कुछ निहित स्वार्थी हैं तो कुछ नासमझ तो कुछ इस समय यह नहीं चाहते कि सरकार को भारत पाकिस्तान संबंधों को एक सही मोड़ देने या इसमें आवश्यक पैराडाइम शिफ्ट का र्शेय मिले। ध्यान रखिए, यहां देश की सुरक्षा गौण है। येचुरी जैसे नेताओं से यह पूछा जाना चाहिए कि कौन सा कूटनीतिक और राजनीतिक कदम? बातचीत क्यों और किससे? समझौता क्यों और कैसा? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवादी बुरहान वानी को नेता बताते हैं और हमारे देश में कहा जा रहा है कि उनसे बात कीजिए।
 
पाकितान के रक्षा मंत्री नाभिकीय बम के प्रयोग की धमकी देते हैं और हमारे देश में लोग बातचीत की वकालत कर रहे हैं। पाकिस्तान उरी में हमला करने वाले आतंकवादियों को अपने देश का नागरिक मानने को ही तैयार नहीं, वह पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादियों को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं, फिर बातचीत किस आधार पर होगी? क्या इसके पहले पाकिस्तान से बातचीत नहीं हुई? क्या हर तनाव के बाद बातचीत की मेज नहीं सजी? यही गलती बार-बार होती रही और हम आतंकवाद के सामने कातर बने रहे।
 
इसी कारण कश्मीर समस्या का समाधान आज तक नहीं हुआ। भारत में पार्टियों से लेकर, बौद्धिक, एनजीओ एवं मीडिया के क्षेत्र में ऐसे लोग हैं जो पूरा वातावरण ही ऐसे पलट देते हैं मानो पाकिस्तान से बातचीत न होने से कोई प्रलय आ जाएगी और सरकारें उनके प्रभाव में आ जाती हैं। मोदी सरकार भी दो साल तक या तो इसी मुगालते में थी कि किसी तरह बातचीत से कुछ रास्ता निकल सकता है या वह अनुभव लेना चाहती थी। नरेन्द्र मोदी स्वयं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर तक गए, उनकी मां के पैर छुए।
 
इससे बड़ा कदम शांति के लिए और क्या हो सकता है? हालांकि पाकिस्तान के चरित्र को समझने वाले जानते थे कि इन सबका कोई परिणाम नहीं निकलने वाला। वह कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहेगा। यही हुआ। बल्कि कश्मीर के आतंकवाद को पड़ोस के पंजाब तक में विस्तारित करने की भी खूनी कोशिशें हुईं। जरा, इस समय की परिस्थितियां देखिए। भारत की कूटनीति और सैन्य मोर्चे के कदमों से जो माहौल बना है देश उसको तार्किक परिणति तक ले जाने की कल्पना कर रहा है।
 
आखिर पाकिस्तान में दक्षेस सम्मेलन को रद कराने के हमारे प्रयास में पांच देशों का साथ मिला। अगर येचुरी जैसों की बात मानी जाए तो हम उन देशों को छोड़कर सीधे बातचीत की मेज पर चले जाएं। फिर हमारी विश्वसनीयता और साख क्या रहेगी। और बातचीत से मिलेगा क्या? 1994 में पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का संसद में जो सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ उसमें माकपा और भाकपा भी शामिल थी। क्या ये मानते हैं कि बातचीत से उस प्रस्ताव को मूर्त रूप दिया जा सकता है? पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पाक अधिकृत कश्मीर हमको सौंप देगा? उसने जो क्षेत्र चीन को दे दिया है वह हमें बातचीत से वापस मिल जाएगा?
 
क्या आतंकवादी हमले रुक जाएंगे? आखिर पाकिस्तान ने जनवरी 2004 में ही अपनी भूमि को आतंकवाद के लिए उपयोग न होने देने का समझौता किया है। उसका कितना पालन किया उसने? युद्धविराम समझौते का कितना पालन किया है पाकिस्तान ने? पता नहीं ये वार्ता उन्मादी इन तथ्यों का ध्यान रखते भी हैं या नहीं। हम न भूलें कि 1971 में उनके 93000 सैनिक हमारे कब्जे में थे। उसका दबाव डालकर हम उनसे कोई शर्त मनवा सकते थे, पर भावुकता में आकर हमने शिमला समझौता कर लिया जिसमें कश्मीर को द्विपक्षीय समझौता मानने के अलावा कुछ मिला ही नहीं।
 
पाकिस्तान उस समझौते को भी मान नहीं रहा है। 1965 में भी हमारी सेना ने पूरे शौर्य का प्रदर्शन किया था। वह युद्ध परिणामकारी हो सकता था कि सोवियत संघ ने मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया और ताशकंद समझौते में हमें कुछ हासिल नहीं हुआ। इन सबका सबक क्या है? यही न कि फिर हमें वह गलती नहीं दोहरानी चाहिए।
 
इस बार चूके तो न जाने कितने वर्षों तक उसका परिणाम देश भुगतता रहेगा इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने दोनों देशों के चाहने पर मध्यस्थता का जो प्रस्ताव दिया है उसके लिए उनका शुक्रिया कहकर यह कहना होगा कि हमें अपने तरीके से निपटने दीजिए, आपको कुछ करना था तो पहले करते। 
 
वास्तव में पहली बार पाकिस्तान को लेकर साफ और दृढ़ पांच स्तरीय व्यावहारिक नीति दिख रही है। एक, पाक अधिकृत कश्मीर के असंतोष का उपयोग कर उसे खाली करने के लिए दबाव बनाना। दो, बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा, सिंध तक के असंतोष को उभारना, उनको मदद करना, वहां मानवाधिकार के हनन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाकर पाकिस्तान को नंगा करना। तीन, उसे दुनियाभर में अलग-थलग करना।
 
चार, उसकी आर्थिक और सैन्य घेरेबंदी के साथ आतंकवादी देश घोषित कराकर प्रतिबंध के स्तर तक ले जाना तथा पांच आतंकवादी हमलों के परिणाम झेलने तक सीमित रहने की जगह आतंकवाद के खिलाफ सर्जिकल कार्रवाई। इन पांच पहलुओं वाली नीतियों की तो अभी शुरुआत हुई है। इसको बहुत आगे ले जाने तथा इसमें और पहलुओं को जोड़ने की आवश्यकता है।
 
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