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सर्जिकल स्ट्राइक पर दोयम दर्जे की राजनीति

By कनक तिवारी | Oct 08, 2016 |
surgical
न दिनों पूरे देश का ध्यान केवल सर्जिकल स्ट्राइक की तोता रटंत में लगा है। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने अपनी फि तरत के अनुसार हाल ही में उरी में आतंकवादी हमला किया। 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। कुछ दिन ठहर कर भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानियों के आतंकी ठिकानों पर हमला कर कई ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। कई पाकिस्तानी आतंकी मारे गए। पाकिस्तान ने उस पर भारत की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक होना इंकार किया है। इंकार तो संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रेक्षक दल ने भी किया है।
 
पाकिस्तान से सच की उम्मीद नहीं की जा सकती। वह अपनी कमजोरी को छिपा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रेक्षक दल से भी तथ्य छिपाया जा सकता है। अचानक विपक्षी दलों ने पाकिस्तान और बाकी देशों की राय के आधार पर केन्द्र सरकार से सफाई मांगी कि वह स्पष्ट करे कि सर्जिकल स्ट्राइक की सच्चाई क्या है। यहां तक तो घटनाRम अपनी जगह ठीक ही समझा जाएगा।
 
मुख्य सवाल है क्या कभी भी किसी सैनिक विवाद या संघर्ष को किसी भी सियासी मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लोकतंत्र एक लचीली परिकल्पना है। अभिव्यक्ति की आजादी का असाधारण अधिकार जनता और प्रेस को है। शासन से सूचनाएं पाने का अधिकार भी संबंधित अधिनियम के तहत नागरिकों को है। देश की सुरक्षा से जुड़े सवालों को लेकर राजनैतिक पार्टियां पाकिस्तान से किसी भी संघर्ष में विजय पाने से ज्यादा उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा वगैरह के चुनावों में जीतने में र्शमशील हैं।
 
प्रधान मंत्री चाहते तो सभी राजनैतिक पार्टियों और नेताओं के प्रमुख प्रतिनिधियों को बुलाकर पूरी स्थिति से वाकिफ करा सकते थे। उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत भी दिखाए जा सकते थे। बंद कमरे में सरकार की रणनीति और नीयत का लेखा जोखा दिया जा सकता था। इससे सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती। लेकिन उन्होने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री वह फ लदार वृक्ष होता है जिसे अपने सियासी वजन के कारण झुकने को भी हथियार बनाना होता है।  इसमें भी कहां शक है कि पाकिस्तानियों से किसी भी संघर्ष में जीतने वाली सरकार अपना राजनीतिक लाभ नहीं छोड़ती।
 
जनता का मनोविज्ञान सर्मथन में बदल जाता है। 1965 और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के घमण्ड को सेना ने नेस्तनाबूद किया। र्शेय प्रधानमंत्रियों लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को मिलना ही था । नरेन्द्र मोदी ने युद्ध तो नहीं जीता। लेकिन उनके द्वारा पोषित कार्पोरेटियों के मीडिया तंत्रों ने सर्जिकल स्ट्राइक को युद्ध बना दिया। वामन अवतार को विराट स्वरूप कर दिया। होने वाले विधान सभा चुनावों में फि र से नरेन्द्र मोदी को अपनी पार्टी के लिए इकलौता स्टार प्रचारक बनना होगा।
 
कांग्रेस किसी भी मुद्दे को ठीक से भुना सकने वाली पार्टी नहीं रह गई। उसके पास करेन्सी तो है, लेकिन नोट बहुत पुराने हैं और सिक्के भी वैसे ही हैं। राजनैतिक पार्टियों में नया चलन है। उनका नेता ऊलजुलूल बयान दे। पार्टी कार्रवाई करने के बदले यही कहे कि वह तो निजी राय है। फि र अधिकारिक प्रवक्ता तोड़ मरोड़ कर दूसरा बयान जारी करें। भाजपा और कांग्रेस ने मुख्यत: जनता को गैर विवेकशील और भेड़ चाल का समझ लिया है।
 
अरविन्द केजरीवाल अलबत्ता नए तरह के विवरणों और व्याख्याओं के कारण सुर्खियों में रहते हैं। कम्यूनिस्ट पार्टियों ने तो अपनी केन्द्रीय भूमिका से ही किनाराकशी कर ली है। प्रादेशिक क्षत्रप ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रा बाबू नायडू और जयललिता वगैरह प्रदेशों के सूबेदार हैं। उन्हें देश तब समझ आता है, जब उनके प्रदेशों का नफा - नुकसान हो। 
 
एक राजनैतिक चतुराई बल्कि मूर्खता साफ तौर से देखी जा सकती है। हर पार्टी और नेता की तरफ से जबरिया बयान आता है कि उन्हें देश की सेना पर गर्व है। ऐसा इसलिए कहते हैं कि युद्ध के खौफ से पीड़ित जनता अपना वोट बैंक उनके लिए सुरक्षित रखे। यदि युद्ध होता है या शांति पर्व हो तो भी सेना पर विश्वास और गर्व रखना हर नागरिक का अधिकार, आचरण और कर्तव्य है। एक लोकतंत्र में लेकिन मौजूदा सरकार या राजनैतिक पार्टियां सेना को कंधा बनाकर अपनी मुश्किलों की राजनैतिक वैतरणी पार नहीं कर सकती। भारत में लेकिन हो यही रहा है।
 
एक परिपक्व लोकतंत्र में सेना को भी हमकदम होने का मरतबा मिलना चाहिए। उसका यह अर्थ नहीं है कि सेना की गतिविधियों के संबंध में सवाल तक करने का जनता का अधिकार छिन जाए। पाकिस्तान के आतंकी लगातार भारतीय सरहद में घुस कर सेना के ठिकानों, सार्वजनिक स्थानों, होटलों, स्टेशनों और संसद तक हमला कर रहे हों। फि र भी जनता का मुंह सिले रखने की सलाह क्यों दी जाती है। 
 
देश की हिफाजत, प्रगति और मजबूती के लिए प्रत्येक नागरिक का अवदान है। नागरिक दोयम दर्जे के नहीं होते। वैसे भी युद्ध एक अभिशाप, अनावश्यकता, उन्माद और निश्कृति है। भारत और पाकिस्तान की जनता युद्ध प्रेमी नहीं हैं। अलग-अलग तरह की शासन प्रणालियां अलग अलग कारणों से सरहद पर तनाव पैदा करती हैं। उसकी पृष्ठ भूमि जानना जरूरी है। पाकिस्तान से फ ौजी स्तर पर निपटने से •यादा केन्द्रीय स्तर पर कष्मीर समस्या हल करने की जरूरत है।
 
यदि कश्मीर के नागरिक सांस्कृतिक एवं देशज स्तर पर देश के अन्य क्षेत्रों से आत्मसात हैं तो क्या कर लेगा पाकिस्तान। जम्मू कश्मीर या पूवरेत्तर नागालैण्ड, अरूणाचल, मणिपुर और असम वगैरह की उत्तरोत्तर होती जन आकांक्षाओं को पुलिसिया कानूनों के जरिये कुचलने का सरकारी ठनगन वषों से जारी है। इरोम शर्मिला की कुर्बानी तक का सरकारी घमण्ड पर असर नहीं पड़ा। कश्मीर के लोग पूरी तौर पर दोषी नहीं कहे जा सकते। सौ दिनों से अधिक चला कफ्यरू किसी भी सरकार की नाकामियों का प्रमाण क्यों नहीं हो सकता।
 
देश की जनता एक लचीला नेतृत्व चाहती है। प्रसिद्ध कवि बाणभट्ट ने अपने अंतिम समय में अपनी खिड़की के बाहर खड़े सूखे पेड़ को दिखाकर अपने बड़े बेटे से पूछा यह क्या है ? बड़े बेटे ने उत्तर दिया गशुश्क: वृक्ष: तिश्ठति अग्रेग। फि र अपने छोटे बेटे से पूछा। जवाब मिला गनीरस तरूवर विलसति पूरत:ग। उसने छोटे बेटे को अपनी कविता का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। देश के सियासतदां खुद को बाणभट्ट का छोटा बेटा समझें तो बेहतर है।
 
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