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कहानी नोटबंदी की..

By अनुज दीप यादव | Nov 29, 2016 |
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कहानी की शुरुआत होती है एक धमाकेदार इनकम डिक्लेरेशन स्कीम से, जो शुरू हुई 1 जून 2016 से और समाप्त हुई 30 सितम्बर को बाद में और भी समय मिला। इसमें आपको बेनामी ट्रांजक्शन एक्ट 1988, वेल्थ टैक्स एक्ट और इनकम टैक्स एक्ट में कार्रवाई से सुरक्षा मिली। साथ ही बड़े आराम से आप 45 % हिस्सा सरकार से साझा कर के बाकी 55 % के कानूनन मालिक बन जाते हैं, जिस पर कोई सवाल नहीं होगा कि ये कैसे जमा किया गया रिश्वत ले के, ड्रग्स के व्यवसाय से या फिर तस्करी से। वैसे ये पहला मौका नहीं था इसके पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर ऐसी स्कीम लाई जा चुकी हैं, जिनमे वर्ष 1997 की, उल्लेखनीय है। बस दोनों में एक बड़ा अंतर है और वो है भारतीय अर्थव्यवस्था के बदलाव का। 1997 ऐसा समय था जब, देश ग्लोबलाइजेशन और दूसरे कई बड़ी घटनाओं के साये में जर्जर हालात से बाहर आने के लिए प्रयासरत था और संसाधनों के इंतेजाम की जुगत में लगा था। पर अब देश की अर्थव्यवस्था विश्व में एक मज़बूत स्थिति में है जिसमे भी क्रय क्षमता आधार पर यह तीसरे नंबर पर है जिसका अर्थ है, भारत दुनिया के लिए एक बड़ा बाज़ार बन चुका है। ऐसे में काला धन निकालने के लिए काले धन वालों पर रहमदिली की ये स्कीम वाक़ई साहेब के विशाल ह्रदय की द्योतक थी ।
 
अब बढ़ते हैं दूसरे पड़ाव की तरफ भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास का एक यादगार दिन (आगे कैसे याद किया जाएगा ये भविष्य ही बताएगा तो भविष्य में वैसे ही याद कर लिया जाये) 8 नवम्बर 2016 और एक बड़ी घोषणा और उससे भी बड़ा एक यज्ञ, एक इम्तेहान- देशभक्ति का, जिसका नोटिफिकेशन प्रधान-सेवक द्वारा रात्रि 8 बजे जारी किया गया। एक ऐसा इम्तेहान जिसमे भाग लेना अनिवार्य है पर देशभक्त होने के लिए बापू के तीन बंदरों वाले  गुण एक साथ प्रदर्शित करना आवश्यक। देशभक्ति के नाम पर विरोध और तकलीफों को बड़े अच्छे तरीके से दबाया गया। बड़े लोगों ने कभी हंस दिया तो कभी रो दिया और आम जनता देशहित में आहुतियां देती रही जिसकी संख्या 65 से अधिक ही हो गई, जिस पर #साहेब ने न मन से बात की और न मन की बात की। लगातार लोकतंत्र की और परिवर्तन की दुहाई देते हुए साहेब ने एक बड़ा परिवर्तन किया कि एक बार भी देश की सबसे बड़ी पंचायत से, इस देश को अपने इतने बड़े निर्णय के परिणामों पर संबोधित नहीं किया। कम्युनिकेशन के एकतरफा साधनों से ही बात की, और पहली बार एक प्रधान-सेवक पंचायत के सवालों से भागते रहे, क्यों? अगर आप अपने निर्णय को पूरी तरह सही समझते हैं तो सवालों से डर क्यों? आप सवालों से भागते रहे और भक्त विरोध को जवाब देकर बंद करने की बजाय विरोध को विरोध से बंद कराने का अजब लोकतान्त्रिक खेल खेलते रहे। सेना का जितना उपयोग इस फैसले की शुचिता सिद्ध करने के लिए किया गया उतना तो शायद कभी किसी का किया जाता हो।
 
खैर इस निर्णय के लिए आपकी अंतर्मन्शा क्या थी वो तो आप खुद ही जाने लेकिन इसका लिया जाना कितना जरूरी था या इसके विकल्प क्या हो सकते थे इस पर विचार करना और भी आवश्यक है। पहला कहा गया कि इससे जाली नोट चलन से बाहर हो जायेंगे- सहमत बिलकुल हो जायेंगे, लेकिन भारतीय सांख्यिकी संस्थान और राष्ट्रीय जांच एजेंसी की 2015 में की गई संयुक्त स्टडी में केवल 400 करोड़ रुपये मूल्य के जाली नोट ही भारत में हैं ऐसा कहा गया। जिसके लिए आरबीआई एक्ट 1934 सेक्शन 26 के तहत  किसी भी सीरीज की नोटों को बाज़ार से हटाया जा सकता है, जैसा समय समय पर रिज़र्व बैंक करता भी रहता है। इसके लिए नोटबंदी की बड़ी आवश्यकता थी ये कुछ अनावश्यक सा लगता है, क्योंकि सरकार के अनुसार जाली नोट बाहरी देशों से अपने देश में आती हैं तो उस पर रोक लगा पाना कितना आसान है या कितना मुश्किल ये प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियां ही बता सकती हैं क्योंकि आये दिन नए नोटों के जाली नोट भी पकडे ही जा रहे हैं।
 
दूसरी बात की गई भ्रस्टाचार खत्म होने की तो क्या नए नोट आने के बाद रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, कालाबाज़ारी और कर चोरी रुक जाएगी। क्या नैतिकता या ईमानदारी जबरदस्ती पालन कराई जा सकती है? गुणों का विकास जबरदस्ती कराया जा सकता है? क्या इसके लिए शिक्षाऔर सामजिक -व्यवस्था फेल नहीं होती जो अपने नागरिकों में बचपन से ही ऐसे गुणों का विकास नहीं कर पाई? क्या रिश्वतखोर अन्य तरीके नहीं ढूंढ पाएंगे रिश्वत लेने के या रिश्वत नहीं ली जा रही हैं।
 
तीसरी बात कही गई राजनीतिक पार्टियों के पास काला धन बेकार हो जाने की। उस पर पहले ही लिख चुके हैं कि आप बहुत बड़े भुलावे में हैं कि पार्टियां अपने काले चन्दे को सफ़ेद नहीं कर पाएंगी। पार्टियों को दिए गए चंदे पर तो इनकम टैक्स की कोई लिमिट ही नहीं हैं उलटे कुछ विशेष तरीकों से चन्दा देने वाले को इनकम टैक्स में रिबेट ज़रूर मिल जाता है। हाँ इसका कोई राजनीतिक निहितार्थ ही हो सकता है जिसके चलते खुद सरकार में रहने वाली पार्टी और खुद साहेब पर आरोप लग रहे हैं। जिसमे सबसे गंभीर आरोप इस निर्णय की गोपनीयता को ले कर ही हैं।
 
और पूरे कथानक का मूल बिंदु - काला धन। जिसके कुल मूल्य को ले कर ही अब तक कुछ अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है, हाँ ऐसे विषय पर बाबा जरूर राजनीतिक प्रवक्ताओं की भूमिका में आ गए और न जाने कहाँ से काले धन की गणना कर लाए। जबकि कई ऐसे धार्मिक और स्वयंसेवी संस्थाओं ने काले धन को गोरा करने की मशीने लगा रखी हैं। खैर, 1 अप्रैल से 31 अक्टूबर 2016 तक की गई इनकम टैक्स की इन्वेस्टीगेशन से जो अनुमानित तथ्य सामने आया वो ये कि देश के भीतर का कुल काले धन का मात्र 5 प्रतिशत ही नकदी में हैं जो 400-500 करोड़ तक के मूल्य में होगा। क्या इसे निकालने के लिए इनकम टैक्स डिफॉल्टर्स के ऊपर कार्रवाई एक विकल्प नहीं हो सकती थी या पनामा पेपर्स में आये नाम जिनमे केपी सिंह, और अडानी जैसे बड़े व्यवसाइयों के नाम थे उन की जांच नहीं की जा सकती थी। अगर आप समझ रहे हैं कि काला धन केवल घर में छुपा होता है तो आपकी समझ काबिले तारीफ़ है। अनेक फ़र्ज़ी कम्पनियाँ बना कर हर साल करोड़ों का काला धन बनता जाता है और अर्थव्यवस्था में घूमता रहता है क्या वो सफ़ेद धन कहा जाना चाहिए। आपके रिश्वत दिए गए पैसे से कोई व्यक्ति शॉपिंग करता है तो आपका सफ़ेद धन पहले काला और फिर सफ़ेद हो जाता है उसे किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए?
 
उस पर भी इसे सरकार का एक कमज़ोर निर्णय ही कहा जा सकता है जिसे लेने से पहले केवल निहित स्वार्थ देखा गया देशहित केवल एक पर्दा बन कर ही रह गया। अगर ऐसा न होता तो ऐसा कोई कारण नहीं था कि सामान्य जनमानस को इतनी समस्याओं का सामना करना पड़ता, अपने ही रुपये को जो उसके जीवन के लिए आवश्यक है, उसे प्रयोग में लाने में बार बार असफल होना पड़ता। ऐसे में इसे जीने के मौलिक अधिकार 21 का हनन क्यों न मान जाये? साहेब ने बगैर कुछ सोचे एक राजनीतिक चाल चली और साथ में देशभक्ति के इंजेक्शन लगाते गए। जिस निर्णय में इतनी कमियां हो कि उसके अनुपालन के लिए 20 दिन में 9 बार नए नियम और नोटिफिकेशन जारी करने पड़े और वो भी धरातल पर पालन न कराये जा पा रहे हों उसे किस आधार पर एक साहसिक और बदलाव लाने वाला निर्णय मान लिया जाए। जैसे सीमा पर शहीद होने वाले व्यक्ति के परिवार के लिए उस व्यक्ति के जाने की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता वैसे ही कतार में खड़े व्यक्ति के मरने के बाद उस परिवार की क्षति किसी भी तरीके से पूरी नहीं की जा सकती। उस पर भी नोटबंदी के 20 दिन बाद सरकार एक बार फिर वही काले धन को सफ़ेद करने की स्कीम लाती है जब शायद बहुत सारे ईमानदार देशवासी अपना पैसा बैंक में जमा करवा चुके हैं और उसी जमा धन की बदौलत हज़ारों करोड़ एनपीए को राइट-ऑफ में बदला जा चुका है, जिसे सामान्य भाषा में कहें तो आपके पैसे से बड़े पूंजीपतियों के क़र्ज़ माफ़ करने की प्रक्रिया में डाला जा चुका है। 
 
एक बार फिर से इनकम डिक्लेरेशन का दौर शुरू किया जा चुका है। इस बार सामान्य भारतीय के खून-पसीने की कमाई जिसे कालाधन रखने वालों ने जमा कर रखा है उसे 49.5-50.5 की साझेदारी में सफ़ेद किया जा रहा है। 70 साल के आंकड़े खोलने के दावे करने वाले साहेब 50 % में काले को सफ़ेद बना का रखने की अनुमति दे रहे हैं। क्या ये 20 दिनों से कतारों में धक्के खाने वालों के साथ ठगी नहीं है जो लाइन में खड़े हो कर अमीरों के गरीब होने के सपने देख रहे थे? उन्हें अपने बराबर पर आते हुए देखने का इंतज़ार कर रहे थे। नोटबंदी के 20 दिन बाद इस स्कीम के आने से नोटबंदी का क्या अर्थ बचता है काला धन तो उसी व्यक्ति के पास ही होगा जिसके पास था, वो भी कानूनन जिस पर उसे कोई सज़ा नहीं होनी। इस सबके बाद किस नज़रिये से नोटबंदी का निर्णय देशहित में था, कृपया समझाएं।    
 
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  • 1 Comments
  • arun | Dec 10, 2016
  • very good article
    Haribhoomi
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