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जासूसी कांड : हम अपने भीतर भी झांकें

By अवधेश कुमार | Nov 03, 2016 |
mehmood
यह जानकर भारत में किसी को हैरत नहीं हुई कि पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात एक अधिकारी भारत की जासूसी कर रहा था। भारतीय रक्षा से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज हासिल करते पकड़े जाने के बाद अधिकारी महमूद अख्तर स्वाभाविक ही अवांछित करार दिया गया और उसे 48 घंटे के अंदर भारत छोड़ने का आदेश दिया गया। जैसी प्रक्रिया है विदेश सचिव एस. जयशंकर ने भारत में तैनात पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित को तलब कर इस बात की जानकारी दी कि पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी महमूद अख्तर को अवांछित घोषित कर दिया गया है।
 
हालांकि अब्दुल बासित ने जासूसी से इनकार किया है और अख्तर के साथ हुए व्यवहार को राजनयिकों को वियना संधि के तहत मिली छूट के खिलाफ बताकर भारत को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है, लेकिन वे भूल गए कि अख्तर के साथ दो भारतीय तो उसी समय पकड़े गए और दो बाद में। पाकिस्तान को बदनाम करना होता तो उसका तरीका दूसरा हो सकता था। 
 
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप की मानें तो महमूद अख्तर ने पूछताछ में बताया कि वह साल 1997 में पाकिस्तानी सेना के 40वीं बलूच रेजीमेंट में भर्ती हुआ था। उसके बाद 2013 में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई में प्रतिनियुक्ति पर आया था। बाद में उसे प्रशिक्षण देकर नई दिल्ली स्थित भारतीय उच्चायोग में भेजा गया। जान बूझकर उसकी नियुक्ति वीजा सेक्शन में की गई ताकि उस भारतीयों से संपर्क बढ़े एवं वह उन्हें किसी तरीके से फंसाकर अपना उप जासूस बना सके।
 
ऐसा उसने किया भी। हम आगे बढ़ें इससे पहले पाकिस्तान के इस आरोप का खंडन आवश्यक है कि भारत ने महमूद अख्तर से पूछताछ के दौरान दुर्व्यवहार कर विएना संधि का उल्लंघन किया। सच यह है कि जब उसे पकड़ा गया उसने स्वयं को भारतीय बताया, प्रमाण में आधार कार्ड दिखाया जिसमें चांदनी चौक का पता दर्ज था एवं नाम मेहबूब राजपूत लिखा हुआ था। 
 
यदि वह आरंभ में ही अपने को पाकिस्तानी दूतावास का अधिकारी बता देता तो पुलिस उसे थाने भी नहीं लाती। पता चलते ही उसे उच्चायोग छोड़ा गया एवं पुलिस ने विदेश मंत्रालय को इसकी जानकारी दी इसलिए पाकिस्तान का यह आरोप निराधार है। इसके जवाब में विकास स्वरूप ने बिल्कुल सही कहा कि उसके साथ राजनयिक शिष्टाचार के साथ ही सलूक किया गया। पाकिस्तान अपनी गलती नहीं मान सकता इसे भी हम अस्वाभाविक नहीं लेते। जब भी ऐसा मामला सामने आया उसकी रवैया नकारात्मक ही रहा है, किंतु उसने जिस तरह इस्लामबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के एक अधिकारी को अवांछित करार देकर पाकिस्तान छोड़ने का आदेश दिया वह एक उचित कार्रवाई का अनुचित और उदंड जवाब है।
 
पाक खुफिया एजेंसी हर तरीके से भारत की सुरक्षा जानकारी में किसी तरह सेंध लगाने की अपनी दुर्नीति पर कायम है। इसका केवल यह एकमात्र प्रमाण नहीं है। इस वर्ष अभी तक 10 से ज्यादा पाकिस्तानी जासूस पकड़े जा चुके हैं। इसका अर्थ आखिर क्या है? यह जानकारी भी हमारे सामने आ ही जाएगी कि अख्तर ने जासूसी में अब तक क्या-क्या प्राप्त किए हैं। उसके साथ दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम ने जिन दो भारतीयों मौलाना रमजान, सुभाष जांगीर को गिरफ्तार किया उनके पास से गुजरात और राजस्थान में भारत-पाकिस्तान सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की तैनाती से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज, मानचित्र और वीजा संबंधित कागजात बरामद हुए हैं। 
 
ये राजस्थान के नागौर के रहने वाले हैं। जोधपुर के शोएब की भी इनके बयानों के आधार पर गिरफ्तारी हो गई है। चौथे आरोपी के रूप में सपा के राज्यसभा सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम के निजी सहायक फहत को पकड़ा गया। पुलिस के अनुसार आईबी से इनको इनपुट मिला था एवं छह महीने से इन पर नजर रखी जा रही थी। जैसे ही पुख्ता सूचना मिली कि ये सभी चिड़ियाघर पर मिलेंगे और कागजातों का आदान-प्रदान होगा तो पुलिस ने जाल बिछाकर सभी को पकड़ लिया।
 
पाकिस्तान की मान लें तों यह पूरी कथा ही मनगढं़त है। यह भारत देश है जहां इस ढंग की कथा बनाने का समय पुलिस के पास नहीं है। उसमें भी जब विदेशी रानजयिक की संलिप्तता हो और मामला विदेश मंत्रालय तक जाने वाला हो तो कहा जा सकता है कि पाकिस्तान को अपने किए पर शर्म आनी चाहिए कि वह राजनयिक छूट का लाभ उठाकर अपने उच्चायोग से इस तरह जासूसी करवाता है, किंतु इसका दूसरा पहलू हमें भी सोचने को बाध्य करता है। आखिर अख्तर किसकी बदौलत जासूसी करता था? भारतीयों की बदौलत। अभी तक मुख्य सूत्रधार के रूप में शोएब का नाम आ रहा है जो जोधपुर में वीजा-पासपोर्ट का काम करता है।
 
शोएब नें मौलाना रमजान को अपने साथ मिलाया और मौलाना ने सुभाष जांगीर को। सुभाष किराने की दुकान चलाता है। वह परिवार का पेट नहीं भर पाता था एवं कर्ज में डूबा था उसे रमजान ने इस काम में पैसे का लालच देकर लगाया। सुभाष जांगीर की दुकान नागौर की गांधी चौक स्थित कुरैशियों की मस्जिद के पास है। इसी मस्जिद में मौलाना तालीम देने और धार्मिक शिक्षा देने का काम करता था। मौलाना अच्छी तरह जानता था कि सुभाष के पास पैसों का अभाव है। इसी का फायदा उठाते हुए उसने सुभाष को अपने चंगुल में फंसाया। फहत के पास तो आर्थिक समस्या भी नहीं थी।
 
पुलिस ने बताया कि इन लोगों ने बीएसएफ के सेवानिवृत्त और स्थानांतरित अधिकारियों की भी जानकारी जुटा ली थी। दिल्ली पुलिस अपराध शाखा के संयुक्त आयुक्त बता रहे हैं कि और भी नाम सर्विलांस पर है। 2013 से अब तक पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में 46 भारतीय पकड़े जा चुके हैं। दिसंबर 2015 से अब तक की यह तीसरी घटना है। दिसंबर 2015 में जम्मू में बीएसएफ के जवान सहित कई लोग गिरफ्तार किए गए। जनवरी 2016 में पठानकोट में वायुसेना के एक जवान रंजीत को पकड़ा गया।  
 
हम दोषी महमूद अख्तर को मानें, पाकिस्तान को या अपने को? अगर हमारे यहां लोग बिकने को तैयार न हों कौन जासूसी में सफल हो सकता है? जम्मू कश्मीर में पिछले एक महीने में दो दर्जन के आसपास अधिकारी-कर्मचारी पाक को खुफिया सूचना देने के आरोप में निलंबित किए जा चुके हैं। आप सोचिए, पाकिस्तानी उच्चायोग में कार्यरत पाकिस्तानी नागरिक का भारत में आधार कार्ड बन सकता है और उसे उसके लिए पता भी मिल गया! यह सामान्य बात है क्या? जाहिर है, कुछ लोगों की इसमें मिलीभगत होगी ही, तो इसकी भी जांच करनी होगी। पाक को चेतावनी देने के साथ हमें अपने अंदर भी झांकने की आवश्यकता है।  

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