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BLOG: पाखंड और झूठ की राजनीति

By ओमकार चौधरी | Nov 06, 2016 |
rahul
क्या राहुल गांधी और केजरीवाल को इसका अहसास नहीं था कि राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आत्महत्या करने वाले पूर्व सैनिक के परिवार से मिलने पहुंचने पर वहां भारी भीड़ जमा होगी और मरीजों, उनके तीमारदारों व व्यवस्थाओं के लिए भारी मुश्किलें खड़ी होंगी? जब दिल्ली पुलिस ने उनसे कहा कि वे वहां न जाएं, तब ये दोनों वहां अड़कर क्यों खड़े हो गए? एक-एक कर कांग्रेस और आप के दूसरे नेता सर्मथकों के साथ क्यों पहुंचने शुरू हो गए? जंतर मंतर पर पिछले कई महीने से कुछ पूर्व सैनिक ओआरओपी की खामियों को दूर करने व उनकी आपत्तियों का निराकरण करने की मांग करते हुए धरना दे रहे हैं। दोनों दलों के किसी भी नेता ने उनकी सुध क्यों नहीं ली? पूर्व सैनिक की आत्महत्या की खबर मिलते ही जंतर-मंतर पर जलसे जैसा वातावरण क्यों बना दिया गया? 

यह अभी जांच का विषय है कि सुसाइड करने वाले रामकिशन ग्रेवाल का कांग्रेस नेताओं से क्या रिश्ता था क्योंकि उनके परिजनों ने अस्पताल से कांग्रेस नेताओं को फोन किए थे। इसी के बाद रणदीप सुरजेवाला और किरण चौधरी राहुल गांधी को लेकर वहां पहुंचे थे। दिल्ली पुलिस के इस अनुरोध को उन्होंने नहीं माना कि वे अस्पताल परिसर में न जाएं क्योंकि भीड़ से मरीजों और अस्पताल प्रशासन को भारी परेशानी होगी। बाकी दलों के नेता भी पहुंचने लगेंगे। पुलिस नहीं चाहती थी कि अस्पताल को राजनीति का अखाड़ा बनाया जाए, परंतु राहुल गांधी, कांग्रेस के दूसरे नेताओं और अरविंद केजरीवाल जंतर मंतर पर इस मुद्दे पर हंगामा करने, केंद्र सरकार खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने और वन रैंक वन पेंशन के मसले पर झूठ, कपट और पाखंड की राजनीति करने की पूरी तैयारी से पहुंचे थे। उनके कार्यकर्ता वहां जुटने लगे। 

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रहे थे। राहुल को अस्पताल के एक दरवाजे से रोका गया तो वह दूसरे दरवाजे पर पहुंच गए। इस बीच उन्हें फोन पर किसी से हंसते हुए बातचीत करते हुए देखा गया, जिसे फोटोग्राफर ने कैमरे में कैद भी किया। अस्पताल के सामने उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को घेरने के लिए जो अखाड़ा जोड़ा था, उससे वह काफी खुश दिखाई दे रहे थे। अस्पताल के आस-पास हालात काबू से बाहर होते देख दिल्ली पुलिस को आत्महत्या करने वाले रामकिशन के परिवार को वहां से हटाना पड़ा। उन्हें मंदिर मार्ग थाने ले जाया गया। अस्पताल के भीतर जाने की जिद पर अड़े दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के बाद राहुल गांधी को भी हिरासत में ले लिया गया। अरविंद केजरीवाल के लिए राहुल गांधी की गिरफ्तारी की खबर सदमे की तरह थी। जाहिर है, अब मीडिया में राहुल की गिरफ्तारी सुर्खी बननी थी। केजरीवाल भी अड़ गए। घंटों खड़े रहे। 

उनके इर्द गिर्द पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्र हो गई। उन्होंने ऐसे हालात उत्पन्न कर दिए कि दिल्ली पुलिस को दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी हिरासत में लेना पड़ा। कुछ घंटे बाद राहुल गांधी छोड़े गए तो फिर से जंतर मंतर पर पहुंच गए। उन्हें दोबारा हिरासत में लेना पड़ा, क्योंकि दिल्ली पुलिस को अंधेरा होने पर उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता थी। यह सब दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। अगले दिन आत्महत्या करने वाले रामकिशन की उनके गांव में अंत्येष्टि थी। राहुल गांधी और केजरीवाल वहां भी पहुंचे। आमतौर पर जब इस तरह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में कोई मौत होती है, तब मौन रहकर लोग अपनी र्शद्धांजलि अर्पित करते हैं, परंतु वहां जमकर राजनीति हुई। केजरीवाल ने सुसाइड करने वाले को अपनी सरकार की ओर से शहीद का दर्जा देने का ऐलान किया। साथ ही उनके परिवार को एक करोड़ रुपये देने की घोषणा भी कर डाली। किसी पूर्व सैनिक की लाश पर इस तरह की ओछी राजनीति का देश में कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलेगा। राहुल के सिपहसालारों ने पीएम मोदी को जमकर कोसा। 

इनमें रोहतक के सांसददीपेंद्र हुड्डा सबसे आगे थे। किसी की अंत्येष्टि पर नेताओं की इस तरह की छिछोरी हरकत पहले शायद ही देखी गई हो। तमाम संवेदनाओं को ताक पर रखकर कांग्रेस और आप की ओर से निचले स्तर की यह राजनीति आखिर क्यों की गई, यह जानना बहुत जरूरी है। उरी में 19 सैनिकों की शहादत के बाद से पूरा देश गुस्से से उबल रहा था। पीएम पर जवाबी कार्रवाई का दबाव था। विपक्षी दल उस समय यह कहते हुए कोस रहे थे कि लाहौर जाकर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने वाले मोदी अब 56 इंच का सीना दिखाएं। विपक्षी दलों को लगता था कि उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नजदीक हैं। वहां मोदी सरकार को वे लोग इस मुद्दे पर जमकर घेरेंगे ताकि भाजपा को आराम से पराजित कर सकें। 
प्रधानमंत्री ने सेना को पाकिस्तान को करारा जवाब देने की छूट दे दी। लिहाजा 28 सितंबर की रात को सेना ने वह किया, जो कभी नहीं हुआ था। नियंत्रण रेखा को पार करके न केवल सात आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया, बल्कि चालीस से ज्यादा आतंकवादियों और कुछ पाक सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस सजिर्कल स्ट्राइक ने मोदी को देशवासियों की निगाह में हीरो बना दिया। चीन को छोड़कर दुनिया के ज्यादातर देशों ने भारत द्वारा सीमा पार की गई कार्रवाई को पूरी तरह न्यायोचित बताते हुए पाकिस्तान को हिदायत दे डाली कि वह अपने यहां से आतंकियों को पूरी तरह खत्म करे। पाक को मोदी की कूटनीति ने पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया। 

प्रधानमंत्री हर दिवाली सरहद पर सैनिकों और उनके परिवारों के साथ मनाते हैं। उनसे पहले किसी प्रधानमंत्री ने वन रैंक वन पेंशन लागू करने का साहस नहीं दिखाया। अनेक पूर्व सैन्य अधिकारी राहुल गांधी के इस बयान से नाराज हैं कि वन रैंक वन पेंशन को लेकर मोदी झूठ बोल रहे हैं। इन अधिकारियों का कहना है कि मोदी सरकार ने इसे लागू कर दिया है। कुछ कामियां हो सकती हैं, जिन्हें दूर किया जा रहा है, परंतु कांग्रेस को इस पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है, जो चालीस साल तक इस मांग पर चुप्पी साधे रही। लोग पूछ रहे हैं कि वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर यूपीए शासन में जब फौजी राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च कर रहे थे, तब राहुल गांधी कहां थे? उन्होंने संसद में यह मसला कभी क्यों नहीं उठाया। अब एक पूर्व सैनिक की लाश पर राजनीति की रोटियां क्यों सेंकने पर आमादा हैं? आखिर यह छल, कपट व पाखंड की राजनीति क्यों? 

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