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पाक की नाभि में आतंकवाद

By डॉ.रहीस सिंह | Oct 28, 2016 |
pakistan
पाकिस्तान अभी तक आतंकवाद को अपनी नाभि में अमृत की तरह मानता रहा है, हालांकि उसे दुष्परिणाम काफी दिनों से देखने को मिल रहे हैं। लेकिन यह भारत के खिलाफ लड़े जा रहे छद्म युद्ध का एक सशक्त हथियार है, इसलिए वह इसे खत्म करने का मनोविज्ञान विकसित नहीं कर पा रहा है। सोमवार को देर रात बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में हुआ आतंकी हमला पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद का ही एक परिणाम है। सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में इन हमलों पर अंकुश लगा पाएगा? क्या अमेरिका और चीन जैसे देश, जो इस आतंकी हमले पर अफसोस व्यक्त करते नजर आ रहे हैं, वे वास्तव में पाकिस्तान को आतंकवाद खत्म करने के लिए विवश कर पाएंगे या फिर उसे इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहेंगे जैसा कि चीन ने मसूद अजहर के जरिए किया है? 
 
क्वेटा में पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर आतंकी हमले में 60 कैडेट्स की मौत हो गई जबकि 100 से ज्यादा पुलिसवाले घायल हुए हैं। पिछले दस साल के रिकाडरें को देखा जाए तो पता चलता है कि पाकिस्तान में हर वर्ष सैंकड़ों लोग ऐसे आत्मघाती हमलों में मारे जाते हैं। इस मानवीय क्षति के बावजूद पाकिस्तानी सेना और चरमपंथ का गठबंधन ताकतवर होता जा रहा है। आखिर वजह क्या है? वजह इतिहास और वर्तमान दोनों में ही निहित है। दरअसल जिन स्थितियों में पाकिस्तान बना था कट्टरपंथी ताकतों का उभार सुनिश्चित था। पाकिस्तान के संस्थापकों और हुक्मरानों को लगा कि इसके जरिये वे भारत को परोक्ष रूप से अपेक्षित नुकसान पहुंचाने में सफल हो जाएंगे इसलिए वे इसे पोषण देने की नीति पर आगे बढ़े, जियाउल हक ने इसे शिखर पर पहुंचा दिया। यह जिम्मेदारी उठाई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने। 1980 के दशक में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को अफगानिस्तान में सोवियत फौजों के खिलाफ बीयर ट्रैप रणनीति में उल्लेखनीय सफलता मिल गई, इसलिए अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी के बाद उसने इसे कश्मीर में भी अपनाने की रणनीति अपनाई। 
 
यहीं से पाकिस्तान में भारत के खिलाफ सतत छद्म युद्ध की शुरुआत की। इसके बाद पाकिस्तान में बहुत सारे आतंकवादी संगठन फले-फूले जिनका मकसद था भारत में विभिन्न भागों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना। इनमें प्रमुख थे-अहले हदीथ, जिसका का सबसे महत्वपूर्ण राजनीति मोर्चा मरकज-दवा-उल-इरशाद था और गुट लश्कर-ए-तैयबा। इसके अतिरिक्त जमायत-उल-उलमा, हरकत-उल-मुजाहिदीन (इसके कार्यकर्ता सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है बल्कि बोस्निया, चेचन्या, म्यांमार, फिलीपींस, ताजकिस्तान तक सक्रिय हैं), जैश-ए-मोहम्मद (इसका राजनीतिक मोर्चा सिपह-ए-सहाबा है और इस आतंकी गुट को सैन्य इंटेलिजेंस का सर्मथन हासिल है)..आदि। ये आतंकी समूह अभी भी सक्रिय हैं, भले ही कुछ के नाम बदल गए हों। क्वेटा हमला इसी की देन है, लेकिन इस हमले में जिस तरह से आतंकवादी अपना-अपना दावा पेश कर रहे हैं उससे यह संदेश मिलता है कि अब पाकिस्तान की वास्तविक ताकत आतंकवादी समूहों में निहित हो गई है और वे शक्ति की प्रतिष्ठा व संतुलन के लिए ऐसी घटनाओं के जरिये शक्ति प्रदर्शन करते हैं। 
 
ध्यान रहे कि क्वेटा घटना को लेकर पाकिस्तानी तालिबान के एक गुट हकीमुल्लाह समूह ने एक बयान जारी किया और पुलिस ट्रेनिंग सेंटर हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन कराची के एक अखबार के मुताबिक कराची तालिबान, जिसे कम लोग जानते हैं, का कहना है कि क्वेटा हमला उसने किया है, जबकि इससे पहले पाकिस्तान के अधिकारियों ने लश्कर-ए-झंगवी नामक चरमपंथी समूह के एक गुट पर आरोप लगाया था। फ्रंटियर कोर के आईजी मेजर जनरल शेर अफगान ने मीडिया को बताया है कि आतंकवादी लश्कर-ए-झंगवी के अल अलीमी गुट के माने जाते हैं जो पाकिस्तानी तालिबान से जुड़े हुए हैं जो अफगानिस्तान स्थित आकाओं से निर्देश प्राप्त कर रहे थे। बाद में इस्लामिक स्टेट समूह ने हमले की जिम्मेदारी ली। उल्लेखनीय है कि लश्कर-ए-झंगवी पाकिस्तान के सुन्नी मुसलमानों का खतरनाक चरमपंथी संगठन है जिसका निर्माण लगभग 30 वर्ष पहले शिया विरोधी मुहिम की शुरुआत के रूप में हुआ। यह ईरान की इस्लामिक क्रांति की प्रतिक्रिया थी जिसे तत्कालीन पाकिस्तान शासक जिया-उल-हक का संरक्षण प्राप्त था। झांगवी की पंजाब प्रांत में जड़ें हैं और बलूचिस्तान में सांप्रदायिक हमले का उसका इतिहास रहा है, विशेषकर खासकर अल्पसंख्यक शियाओं के खिलाफ। 
 
जो भी हो, इस आतंकवाद ने बलूचिस्तान को कब्रगाह में बदलने में महत्पूर्ण भूमिका निभाई है। मकरान तट पर स्थित सामरिक-रणनीति के महत्व वाले बंदरगाह ग्वादर के साथ ईरान, अफगानिस्तान और दक्षिण में अरब सागर इसकी बाहरी सीमाओं का निर्धारण करते हैं। सुई के गैस भंडार दुनिया के बड़े गैस भंडारों से प्रतिद्वंद्विता रखते हैं। नृजातीय (एथनिक) विभाजन पर ध्यान दें तो यह प्रांत मूलत: बलूच और पठानों में विभक्त है। कुदरें की तरह ही बलूच भी आधुनिक राजनीतिक भूगोल तैयार करने वालों की उपेक्षा का शिकार हुए हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बलूचिस्तान खनिज और प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न होने के बावजूद नीची साक्षरता दर, स्वास्थ्य, मातृत्व मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में बहुत पीछे है। यही वजहें बलूचों को विद्रोह के लिए प्रेरित करती हैं। दरअसल औपनिवेशिक काल में बलूचिस्तान ब्रिटिश भारत और बलूच राज्य के बीच विभाजित था। अंग्रेजों ने दक्षिण पश्चिम में अपने हितों के कारण 1878 की संधि द्वारा कलात के खान को क्वेटा से कलात, मकरान, खरान और लासबेला पर स्वतंत्र रूप से शासन करने का अधिकार दे दिया था। 
 
कलात का खान सामान्य रजवाड़ों की र्शेणी में नहीं आता था बल्कि उसे हैदराबाद के निजाम और कश्मीर के महाराजा जैसी उच्च एवं विशिष्ट स्वायत्तता हासिल थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बलूच राष्ट्रवादियों ने बलूच आदिवासियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया। विशेष बात तो यह है कि वे इकबाल के 'ऑटोनामस फेडरेशन ऑफ मुस्लिम स्टेट' के सिद्धांत से सहमत थे जिसमें बलूचिस्तान भी शामिल था, लेकिन वे पंजाबी राष्ट्रवाद का हिस्सा बनने से ऐतराज करते थे। यह विशेषता वहां अभी भी निहित है, इसलिए पाकिस्तान के सुन्नी पंजाबी शासक इन चरमपंथी संगठनों जरिए बलूच राष्ट्रवाद को कुचलने की युक्तियों पर काम करते रहे हैं। बहरहाल पाकिस्तानी सुन्नी हुक्मरानों द्वारा बलूचिस्तान के विरुद्ध अपनाई गई नीतियों का ही परिणाम है क्वेटा हमला। हालांकि अब हमलों का टारगेट बदलता दिख रहा है। 
 
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