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बहस का मतलब युद्ध तो नहीं

By प्रमोद जोशी | Oct 16, 2016 |
muslim
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ट्रिपल तलाक और समान नागरिक संहिता के सवाल को मिलाकर और विधि आयोग की प्रश्नावली का बहिष्कार करके अपना रुख साफ कर दिया है। बोर्ड की केन्द्र सरकार से असहमति में कुछ गलत नहीं, पर सरकार पर मुसलमानों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप ज्यादती है। बोर्ड की प्रतिक्रिया से राजनीति की गंध आती है। कहा जा रहा है कि सरकार विधेयक लाने वाली है। विधि आयोग की प्रश्नावली से यह जरूर लगता है कि इसे चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, पर इसकी सलाह तो सुप्रीम कोर्ट ने दी ही है। बोर्ड क्यों मानता है कि इस पर चर्चा करना मुसलमानों के खिलाफ युद्ध की घोषणा है?
 
इस वक्त दो मामले एक साथ मिल गए हैं। काशीपुर की शायरा बानो द्वारा कोर्ट में तीन तलाक को चुनौती दिए जाने के बाद समान नागरिक संहिता सहज रूप से बहस का विषय बनी है। खासतौर से तब जब पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।
 
पहला यह कि क्या तीन बार जुबानी घोषणा करके तलाक देना धार्मिक व्यवस्था है? ऐसा है तो दुनिया के 21 देशों में इस पर रोक क्यों है? जिन देशों में इस प्रथा पर रोक है उनमें पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं, जो भारतीय समाज से पूरी तरह जुड़े रहे हैं। दूसरा यह कि भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों से क्या किसी व्यक्ति को इस आधार पर वंचित किया जा सकता है कि धार्मिक व्यवस्था आड़े आती है?
 
ऐसे में संवैधानिक व्यवस्था लागू होगी या धार्मिक व्यवस्था, संविधान का अनुच्छेद-14 सभी नागरिकों को कानून का समान संरक्षण देता है। तीसरा सवाल है कि क्या देश को अब ऐसी समान नागरिक संहिता के बारे में विचार नहीं करना चाहिए जिसके तहत सभी समुदायों और मतावलम्बियों से जुड़े प्रत्येक नागरिक पर एक ही कानून लागू हो? अभी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और अनुरक्षण (भरण-पोषण) से जुड़े मामलों में निपटारा संवैधानिक कानून के स्थान पर धर्मग्रंथों और परंपराओं के आधार पर होता है।
 
हमारे संविधान के नीति-निर्देश तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 में कहा गया है, राज्य, भारत के समस्त नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। इसे लागू करने का समय कब आएगा? मुसलमानों की संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए। सामाजिक बदलाव उनके समाज पर छोड़ना चाहिए कि वे आधुनिक संदभरें में कैसे बदलाव लाते हैं। यह देखना मुस्लिम धर्मगुरुओं का काम है कि पिछले चौदह सौ साल से ज्यादा समय में उनकी परंपराओं में कोई बदलाव हुआ है या नहीं।
 
यह बात का एक पहलू है। दूसरा पहलू संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा है। देश में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लीकेशन एक्ट साल 1937 में लागू हुआ था। अंग्रेजों की कोशिश थी कि भारतीयों पर उनके सांस्कृतिक नियम ही लागू हों। देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कोड हैं। साल 1936 का पारसी विवाह-तलाक एक्ट और 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम इसके उदाहरण हैं। सवाल तब उठता है जब कोई व्यक्ति संवैधानिक कानूनों के तहत अपने अधिकारों की मांग करे। जैसा कि 1985 में शाहबानो मामले में हुआ।
 
पत्नी के भरण-पोषण के मामले में इस्लामी व्यवस्थाएं हैं, पर शाहबानो ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत न्याय मांगा था। पत्नी, नाबालिग बच्चों या बूढ़े मां-बाप, जिनका कोई सहारा नहीं है, और जिन्हें उनके पति, पिता ने छोड़ दिया है, वे धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। इसके तहत पति या पिता का जिम्मा बनता है। अदालत ने जब फैसला किया तो राजीव गांधी की सरकार ने कानून ही बदल दिया, पर यह समस्या का समाधान नहीं था, बल्कि आधुनिक न्याय-व्यवस्था से पलायन था।
 
पर्सनल लॉ के मसले केवल मुसलमानों से ही जुड़े नहीं हैं। दूसरे धर्मों के मामले भी है। समान नागरिक संहिता पर फैसला जल्दबाजी में नहीं हो सकता। पिछले साल एक केस की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया था कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार केवल संसद के पास है। हम अतीत में ऐसे कानून की उपादेयता बताते रहे हैं, पर कोर्ट इस मामले में सरकार को निर्देश नहीं दे सकती।
 
इसके बाद सरकार ने विधि आयोग से इस मामले पर रिपोर्ट मांगी। उसी सिलसिले में आयोग ने प्रश्नावली जारी की है। कहा जा रहा है कि सरकार इन मामलों को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उठाना चाहती है, पर यह सवाल जब भी उठेगा तब उसे राजनीति से प्रेरित माना जाएगा। क्या कभी ऐसा समय आएगा जब सभी राजनीतिक दल इस सवाल पर बहस को जरूरी मानेंगे? अच्छी बात है कि पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने ‘ट्रिपल तलाक’ पर मुसलमानों से आग्रह किया है कि वे खुद को सुधारने पर विचार करें। 
 
क्या धार्मिक मान्यताएं आधुनिक जीवन के साथ मेल खाती हैं। यह किसी एक धर्म का मामला नहीं है। संविधान निर्माताओं ने जिन कारणों से तब कोई फैसला नहीं किया क्या वे कारण 69 साल बाद अभी कायम हैं? इसे टालने से क्या सामाजिक बदलाव आ जाएगा? क्या यह मान लें कि मामले को जस का तस रहने दिया जाए? बहस का विरोध करने वाले कहते हैं कि संविधान में मौलिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्वों के ऊपर रखा गया है।
 
संविधान का अनुच्छेद 13(1) कहता है, इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं। जब इस अधिकार की बात आई तब साल 1952 में मुंबई हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 13 पर्सनल लॉ को कवर नहीं करता है। अब सरकार इस फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट की राय चाहती है।
 
याचिका दायर करने वाले ने पूछा था, पर्सनल लॉ के कारण कोई महिला प्रताड़ित होगी तो क्या किया जाएगा? कोर्ट ने कहा, महिला प्रताड़ना को सामने रखेगी तो कोर्ट हस्तक्षेप करेगी। यह वोट की राजनीति से जुड़ा मसला है, इसलिए कई पेंच हैं पर बहस से क्यों भागते हैं?
 
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