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अब क्या बचा रहे मुलायम

By कृष्ण प्रताप सिंह | Oct 27, 2016 |
mulayam
जब आप ये पंक्तियां पढ़ेंगे, उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का घमासान थोड़ा थमा हुआ भी दिख सकता है और बढ़ा हुआ भी, लेकिन स्थितियां जिस मोड़ तक पहुंच गई हैं, उसके मद्देनजर घमासान के खात्मे के प्रति आश्वस्त होना या इस सवाल का जवाब तलाश पाना फिर भी संभव नहीं होगा कि मुलायम सिंह यादव अभी भी उसमें क्या बचाने की कोशिश कर रहे हैं? अगर पार्टी तो वह तो कब की उनके परिवारवाद की शिकार होकर दम तोड़ चुकी है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि परिवार के इमोशनल ड्रामे के अंतहीन हो जाने के बावजूद उसमें उसके विधायक दल की कोई भूमिका तो कौन कहे, दूर या नजदीक से आती कोई आवाज तब सुनाई नहीं पड़ रही, इसलिए कि वह आंतरिक लोकतंत्र से पूरी तरह महरूम है और उसमें राजनीतिक असंतोषों या तोड़-फोड़ की अपनी प्रवृत्ति के लिए बदनाम समाजवादियों को पहले ही ठिकाने लगाया जा चुका है। 
 
साथ ही नेताओं की जगह उन वफादारों ने ले ली है, जिनमें कोई मतभेद है तो सिर्फ यह कि वफादारी अखिलेश के प्रति हो या शिवपाल अथवा मुलायम के। इतिहास गवाह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में मुलायम ने अपने नाम पर वोट मांगकर अपने बेटे की ताजपोशी करा दी तो भी दो सौ से ज्यादा सपा विधायकों में उसके कुछ चाचाओं को छोड़कर किसी को भी इस वंश या परिवारवाद पर कोई आपत्ति नहीं थी। अब भी, जब चाचा और भतीजा किसी सल्तनत के वारिसों की तरह पार्टी व सरकार पर आधिपत्य के लिए भिड़े हुए हैं, विधायकों का उन पर इतना भी दबाव नहीं है कि वे उन्हें न्यूनतम लोकतांत्रिक तकाजों के प्रति गंभीर रहने के लिए कह सकें। उन्होंने लगातार 'जो हुक्म, आका' जैसी मुद्रा अख्तियार कर रखी है और निजी नफे-नुकसान के लिहाज से अपना पक्ष तय करने में सक्रिय होने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गड़ाए चुपचाप तूफान के शांत होने की बांट जोह रहे हैं। 
 
सांसद तो ज्यादातर मुलायम परिवार के ही हैं। इस घमासान से पार्टी तो क्या कार्यकर्ताओं के दिल तक टूट गए हैं और पार्टी की टूट का ऐलान सिर्फ इसलिए नहीं हो रहा कि अभी दोनों पक्ष उस पर कब्जे की होड़ में हैं। जाहिर है कि ऐसे में कोशिशें परिवार बचाने की ही हैं, जो इसलिए सफल नहीं हो पा रहीं कि जिन नीतियों, सिद्धांतों व विचारों के आधार पर मुलायम उसे बचा सकते थे, अपने डबल ट्रिपल गेमों के चक्कर में उन्हें पहले ही तिलांजलि दे चुके हैं। आज किससे छिपा है कि इस परिवार की बेल को अमरबेल बनाने के ही चक्कर में जो मुलायम कभी सामाजिक न्याय आंदोलन के सिपहसालार थे, बसपा से गठबंधन टूटने के बाद दलितों को छोड़ केवल पिछड़ों के नेता रह गए। फिर एमवाई समीकरण के चक्कर में धर्मनिरपेक्षता के सिपहसालार और मुसलमानों व यादवों के नेता बने तो भी सिमटते-सिमटते महज दबंग यादवों के, फिर महज अपने परिवार के नेता रह गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में तो उनकी अपील इतनी सीमित हो गई कि पार्टी के नाम पर महज वे और उनके परिजन ही जीत पाए। कुल पांच सीटों में से दो पर मुलायम खुद और बाकी तीन पर उनकी बहू डिंपल, भतीजे धर्मेन्द्र और अक्षय यादव। बाद में उपचुनाव में तेजप्रताप उर्फ तेजू के रूप में मैनपुरी से उनकी एक और पीढ़ी लोकसभा पहुंच गई। 
 
हैरत है कि इस बंटाधार के बावजूद बेटे व भाई के बीच का विवाद सुलझाने के लिए वे बिना किसी अपराध बोध के उन मध्य या उच्चमध्य वर्गीय पारिवारिक नैतिकताओं का सहारा ले रहे हैं, जो पहले ही संयुक्त परिवारों को बचाने में विफल हो चुकी हैं। हम जानते हैं कि अभी हाल तक वे सत्ता की होड़ में प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के खिलाफ सपा के अभियानों को स्वतंत्रता संघर्ष जैसा दर्जा देकर अपने परिवारवाद को 'संघर्ष का परिवारवाद' बताते रहे हैं। अब वह सत्ता के परिवारवाद में बदल गया है, तो भी इस भ्रम से नहीं उबर पा रहे कि वे हमेशा के लिए उसके शिखर पुरुष हैं और पार्टी की तरह उसे भी नितांत व्यक्तिवादी ढंग से जिस दिशा में चाहें हांक सकते हैं। उनकी मुश्किलें और मोह देखिए कि वे अखिलेश में लगातार वह आदर्श भारतीय बेटा तलाशते रहते हैं जो मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद भी आज्ञाकारिता की मिसाल बना रहे। 
 
इतना ही नहीं, उनके भाइयों अमर सिंह और शिवपाल के साथ मुख्तार अंसारी तक ने उन पर कभी न कभी जो एहसान कर रखे हैं, बिना हील-हुज्जत किए उनका कर्ज उतारता रहे और अपनी ओर से सारे फैसले पिता के तौर पर उन्हें करने दे। उन्होंने अपने खून पसीने से कमाई राजनीतिक विरासत उसे ऐसे ही थोड़े सौंप दी है। सोचिये, कहां तो पार्टी सुप्रीमो के तौर पर उन्हें उसमें आदर्श मुख्यमंत्री तलाशना और खुश होना चाहिए था कि अब लर्निंग नहीं रहा, अपने फैसले खुद करने लगा है और कहां वे उस वकील की तरह दुखी हो रहे हैं जो अपने बेटे को वकील बनाने के बाद इसे लेकर दुखी था बेटा उसके द्वारा लटका रखे गए मामलों को जल्दी-जल्दी फैसले कराकर अपनी जड़ ही काट दे रहा है। भले ही मुलायम डबल गेमों के महारथी हों, वर्तमान की समस्याओं को इतिहास में जाकर हल करने के सर्वथा असंभव पराक्रम को कैसे संभव कर सकते हैं? 
 
खासकर जब उन्हें सामंतों की तरह बताना पड़ रहा है कि अभी वे इतने कमजोर नहीं हुए और बेचारगी ऐसी है कि कोई पक्ष चुनने के जोखिम से बचने के लिए सबको खुश करने में लगे हुए हैं। यह भूलकर कि जो सबको खुश करने के चक्कर में पड़ता है, किसी को भी खुश नहीं कर पाता। रामगोपाल ने जो कुछ कहा है, उससे और कुछ नहीं तो इतना तो सिद्ध ही हो चुका कि मुलायम अब तक जिस परिवार को अपना कहते रहे हैं, अब वह उनका अकेले का नहीं रह गया है। न अब वे उसके शिखर पुरुष हैं और न ही उसमें उनकी तूती बोलती है। यहां तक कि अब उनकी नसीहतों और फटकारों से उनके बड़े बेटे तक को कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए कि साढ़े चार साल मुख्यमंत्री रह लेने के बाद वह जान गया है कि वे लाख उसे शराबियों व जुआरियों का संरक्षक बताते रहें, उनका मोह उन्हें राजपाट नहीं छीनने देगा, इसीलिए वे इस भ्रम में कि बेटे व भाई को गले मिलवा देने से समस्या हल हो जाएगी, दोनों को गले मिलवा देते हैं तो गिले और बढ़ जाते हैं। 
 
उन्हें याद होगा, इसी बेटे को राजनीति में लाने का ठीकरा वे छोटे लोहिया के नाम से जाने जाने वाले अपनी पार्टी के नेता स्वर्गीय जनेश्वर मिर्श पर फोड़ते और कहा करते थे कि वही मेरी इच्छा के बावजूद इसे इस 'संघर्ष' में खींच लाए, लेकिन अब दूसरे लोग कह रहे हैं कि उनकी दूसरी पत्नी साधना और उनसे जन्मे बेटे प्रतीक की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी उफान पर हैं और सपा के सत्ता संघर्षों को किसी न किसी रूप से प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में मुलायम क्या और कैसे बचा पाएंगे? 
 
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