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इस्लामिक कट्टरता के बीच बलूचिस्तान में नवरात्र

By डॉ. चंद्र त्रिखा | Oct 10, 2016 |
hindu
पाकिस्तान में अब भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां नवरात्र मनाए जाते हैं और देवियों के सभी रूपों को याद किया जाता है। इन्हीं में से एक है हिंगलाज देवी का मंदिर। यह मंदिर बलूचिस्तान के जिला लासबेला के कस्बे हिंगलाज में ही स्थित है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हजारों लोग इस बार भी इस मंदिर में पहुंच गए थे। इसी कस्बे के हिंगोल नेशनल पार्क में स्थित है हिंगलाज माता का मंदिर, जिसे हिंगला देवी और नानी-मंदिर के नाम से भी पुकारा जाता रहा है। यह मंदिर पौराणिक शक्तिपीठों में से एक है।
 
हिंगोल नदी के तट पर एक पर्वतीय गुफा में स्थित इस मंदिर की पौराणिक मान्यताएं भी शिव-सती प्रकरण से जुड़ी हुई हैं। यह स्थल लयारी तहसील का एक भाग है। कराची के उत्तर-पश्चिम में लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर की अरब सागर से दूरी मात्र 19 किलोमीटर है, जबकि सिंधु नदी के पश्चिमी किनारे लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर हैं। खीरकाड़ पर्वतीय श्रृंखला की गोद में ही स्थित है यह मंदिर। यहां पर मां की पूजा एक पिंडी के रूप में होती है जिस पर सिंदूर का लेप चढ़ा रहता है।
 
संभवत: सिंदूर के लिए संस्कृत शब्द हिंगुल से ही इस देवी को हिंगुला देवी भी कह दिया जाता है। हिंगलाज के आसपास ही गणेश व काली की मूर्तियां, गुरु गोरखनाथ की धूनी, ब्रrाकुंड, तीर कुंड, गुरुनानक खड़ांऊ, रामझरोखा बैठक, अनिल कुंड, चन्द्र कूप, अघोरी मंदिर आदि स्थल हैं। अघोरियों से जुड़े कुछ स्थल समीपस्थ चौरासी पर्वत की कंदराओं में भी स्थित हैं। हिंगलाज माता की गाथा प्रजापति दक्ष की सुपुत्री सती से जुड़ी है। सती ने अपने पिता प्रजापति दक्ष की इच्छाओं के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था और उनके साथ ही कैलाश पर्वत पर रहने लगीं थीं।
 
प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था, मगर शिव की उपेक्षा की गई थी। यज्ञ में दक्ष ने अपनी बेटी सती को भी आमंत्रण नहीं भेजा था। भगवान शिव के प्रति असम्मान दिखाते हुए दक्ष ने यज्ञ-मंडप के बाहर शिव की एक प्रतिमा द्वारपाल के रूप में स्थापित करा दी थी ताकि उन्हें सार्वजनिक रूप में अपमानित किया जा सके। सती को जब इस यज्ञ का पता चला तो वह पिता के उस व्यवहार पर क्षोभ व्यक्त करने के उद्देश्य से यज्ञ स्थल पर अनिमंत्रित रूप में ही जा पहुंची थीं।
 
वहां जाकर शिव के अपमानित स्वरूप को देखते ही क्षुब्ध सती ने यज्ञ की अग्नि में ही अपनी देह की आहुति डाल दी और प्राण त्याग दिए। भगवान शिव को जब इस दुखद प्रकरण की सूचना मिली वह सती-वियोग में क्षुब्ध एवं व्याकुल हो उठे। उन्होंने वहां पहुंचकर सती का अधजला शव उठाया और उसे बाहों में लेकर समूचे ब्रrांड में आकुलतापूर्वक तांडव नृत्व करने लगे। प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार शिव के इस रौद्र रूप से तीनों लोकों में हा-हाकार मच गया।
 
शिव को सती के शव से मुक्त करने के लिए अंतत: भगवान विष्णु सक्रिय हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से सती की मृत देह को खंड-खंड किया। उस देह के 52 अंश जहां-जहां पृथ्वी पर गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए। वियोग के मोहपाश से मुक्त शिव ने स्वयं भी उन सभी शक्तिपीठों पर पूजा कर प्राणप्रतिष्ठा की और सभी शक्तिपीठों पर भैरव के रूप में स्वयं भी स्थापित हो गए।
 
पौराणिक मान्यता यही है कि सती का मस्तक इसी स्थान पर गिरा था जिसे हिंगलाज तीर्थ के रूप में शक्तिपीठ घोषित किया गया। इन पीठों की संख्या अलग-अलग तंत्र ग्रंथों में अलग-अलग दर्शाई गई है। 16वीं शती के बांग्ला-ग्रंथ चंडीमंगल में विद्वान लेखक मुकन्द राम ने दक्ष-यज्ञ-भंग के प्रकरण में मात्र 9 पीठों को मान्तया दी है और इसमें हिंगलाज को प्रथम स्थान पर रखा गया है। इस ग्रंथ के अनुसार इसी स्थल पर सती की नाभि गिरी थी। ब्रrाक्षत्रिय समुदाय के लोग हिंगलाजा माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं।
 
उनमें प्रचलित कथा के अनुसार जब भगवान परशुराम पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने पर लगे थे तब कुछ ब्राrाणों ने 12 क्षत्रियों को शरण दी थी और उन्हें प्रकट रूप में ब्राrाण ही बताया था। इनकी रक्षा हिंगलाज माता ने भी की। उन क्षत्रिय जातियों के लोग स्वयं को ब्रrाक्षत्रिय मानते हैं। एक और किवदंती यह भी है कि ऋषि दधिचि ने सिंध के शासक रतनसेन को अपने आर्शम में सुरक्षा प्रदान की थी, लेकिन रतनसेन एक बार किसी कार्यवश आर्शम से बाहर निकला तो परशुराम ने उसे भी मार डाला।
 
मगर उसके बेटे जयसेन आर्शम में ही सुरक्षित रहे। परशुराम जब आर्शम में आए तो उन बेटों को ब्राrाणपुत्र के रूप में ही परिचित कराया गया। कुछ समय बाद दधिचि ऋषि के माध्यम से हिंगलाज माता का रक्षा मंत्र लेकर जयसेन सिंध लौटे ताकि राजपाट संभाल सकें तो हिंगलाज माता ने न केवल जयसेन की रक्षा की बल्कि परशुराम को भी हिंसा-त्याग के लिए प्रेरित किया। स्थानीय मुस्लिम भी, हिंगलाज माता को पूरी र्शद्धा से देखते हैं। वे इसे नानी-मंदिर के नाम से पुकारते हैं। कुछ मुस्लिम इसे बीबी-नानी भी कहते हैं।
 
कुषान काल में प्रचलित कुछ मुद्राओं पर भी बीबी-नानी के चित्र भी मौजूद हैं। स्थानीय मुस्लिम यहां की यात्रा में भी भाग लेते हैं और इसे नानी का हज कहते हैं। हर वर्ष हिंगलाज माता मंदिर की चार दिवसीय तीर्थ यात्रा आयोजित होती है। मुख्य समारोह तीसरे दिन होता है। उस दिन कर्मकांड में दीक्षित विद्वान पंडित मंत्रोच्चार से देवी का आह्वान करते हैं और र्शद्धालुओं द्वारा लाई भेंटें स्वीकार करने का आग्रह करते हैं। इस यात्रा में पूरे पाकिस्तान व भारत के कुछ भागों से आए यात्री भाग लेते हैं। कराची से हिंगलाज की 328 किलोमीटर की यात्रा मकरान कोस्टल हाईवे की बेहतरीन सड़क के कारण लगभग 4 घंटे में पूरी होती है। कुछ यात्री अब भी साइकिलों पर आते हैं।
 
उनकी मान्यता है कि यात्रा में जितनी सादगी होगी और जितना कष्ट शरीर को मिलेगा, उतना ही पुण्य भी मिलेगा। चलिए, कामना करें कि निकट भविष्य में र्शी ननकाना साहब की तर्ज़ पर हिंगलाज माता, कटास राज, शादानी दरबार व मुल्तान के आदित्य मंदिर के द्वार भी भारतीय हिन्दू र्शद्धालुओं के लिए खुले और हम लोग अपने पड़ोसी देश के आतंकी-दानवों के अंत के लिए प्रार्थनाएं कर सकें।
 
यात्री चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं। प्रचलित आस्था यही है कि इन कुओं का पवित्र जल मन को शुद्ध करके पापों से मुक्ति दिलाता है। इसके निकट ही पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई द्वार नहीं। मंदिर की परिक्रमा में गुफा भी है। यहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इसके निकट ही पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई द्वार नहीं।
 
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