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BLOG: लालबुझक्कड़ों का मीनाबाजार

By कनक तिवारी | Nov 05, 2016 |
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देश में खबरों की रेलमपेल है। प्रदर्शन, विज्ञापन, संसूचनाओं, बाजारवाद और अमीर होने की हवस है। अखबार विज्ञापनों से पटे पड़े हैं। व्यावसायिक नैतिकता त्यागकर शुरूआती पूरे पृष्ठ विज्ञापनों से रंगे होते हैं। चोली साड़ी बिक रही है। मकानों की नुमाइश हो रही है। दवाइयां बिक रही हैं। कहीं बाद में किसी देश के नायक के मरने की खबर छपती है। सैकड़ों यात्रियों को लेकर डूब गया हवाई जहाज अंदरूनी पृष्ठों में डूब जाता है। महिला अत्याचार, चोरी आगजनी और हत्याएं महाशयां दी हट्टी के मसालों जैसी चटपटी बनाकर छापी जाती हैं।
 
कुंठा पर मलहम का लेप होता है। किसानों की आत्महत्याएं कीड़े मकोड़ों के मरने की तरह बरायनाम औपचारिक अंदाज में छपती हैं। गंभीर विषयों पर लिखने की तमीज, अध्ययन और ललक नब्बे प्रतिशत अखबारनवीसों में नहीं बची। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकारिता का माध्यम नहीं है। चैनल के एंकर और देश के नेता अदाकारों की तरह बड़े जतन से ड्रामाई अंदाज में पेश होते हैं। चिकने चुपड़े चेहरों और भड़कीले वस्त्रों से अमीरी की गंध आती है। गरीबी की बात करते व्यंग्य से मुस्कराते भी हैं। लगता है मैयत पर तेरहवीं के भोज में ज्यादा दिलचस्पी है बनिस्बत मृतक के लिए दुख। 
 
राजनीति को समुद्र समझा गया है। उसमें शिरकत करते नेता नदियों की तरह प्रवाहमान, शुद्ध तरलता और उर्वरता के यौगिक बिखेरते चलते थे। सीमित हुआ तो बड़ी झील की तरह प्राकृतिक बना रहा। धीरे- धीरे नदियां सूखने लगीं। उन पर कालेबाजारियों, पूंजीपतियों, जमाखोरों, मुनाफाखोरों के बांध बंधने लगे। नेतागिरी तालाब बन गई। बंधे हुए जल के चरित्र में सड़ांध आ गई। तालाब भी सूखने लगे। छोटे किसानों के कुएं और बावड़ियों की भी भ्रूण हत्या होने लगी। धरती का गर्भ फाड़कर देश का धन चुपके चुपके अमीरों के नलों में आने लगा। 
 
जनता ने घूसखोरी कहा। कोई नेता या नौकरशाह छाती ठोककर नहीं कह सकता कि मुझ पर आरोप तो लगाएं। सिद्ध तो करें कि मैं रिश्वत लेता हूं। कोई उद्योगपति हलफ उठाकर कहे कि मैंने कभी घूस नहीं दी है। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक सम्मेलन हो रहे हैं। अपढ़ ज्ञानियों की मटरगश्ती दिमाग से नहीं हैसियत से टपकती है। राजनीतिक तर्कशास्त्र के नये प्रवक्ता पैदा हो गए हैं। कहता है सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की हालत और कुछ होती। संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। सरदार 15 दिसम्बर 1950 को चले गए। फिर भी देश की हालत कुछ और होती। 
 
सैनिक रामकिशन ने आत्महत्या कर ली। दीवाली के दिन प्रधानमंत्री ने फौजियों के बीच ऐलान किया था। सरकार ने एक रैंक एक पेंशन की फौजियों की मांग पर अमल कर दिया है। रामकिशन इस असत्य से भी पीड़ित बताया गया। सोशल मीडिया सामाजिक विर्मश के नाम पर भड़ास निकालने का घटिया माध्यम हो रहा है। शब्दवीरों के रॉकेट चलते हैं। स्त्री, लड़की, जानवर का काटरून का चेहरा बनाकर फेसबुक एकाउंट खोलते हैं। शिक्षा दीक्षा, व्यवसाय या शहर का नाम तक नहीं डालते।
 
संविधान, राजनीतिशास्त्र, समाजविज्ञान का ककहरा तक नहीं पढ़ते। टिप्पणी किए पड़े हैं। उत्तर नहीं होता। अश्लील भाषा का प्रयोग करते हैं। कोई नहीं जानता कि गाली देने वाला व्यक्ति काल्पनिक है या असली। ऐसे आंकड़ों और तर्कों के साथ हमला करते हैं जो सरकार को नहीं मालूम। इतिहास के कूड़े की जुगाली की जा रही है। तमाशबीनों की निठल्ली भीड़ लोकसंसद बन रही है। अश्लील गालियां देना नया सामाजिक उद्योग है। 
 
फिल्मी सितारे नौजवानों, स्त्रियों और सामान्य दर्शकों की अधकचरी कलात्मक अभिरुचियों के कारण देश के नायक होते हैं। स्त्रियों, शराब, कालेबाजार, हथियारों और अपराधों से घिरी सात सितारा जिंदगी के बावजूद उनमें नेता बनने की हविश सांप की फुफकार की तरह है। क्या भला किया है इन सिने कलाकारों ने देश का। इन्हें अध्यापकों, वकीलों, स्वतंत्रता सैनिकों और समाज सेवकों की जगह संसद को नुमाइशघर बनाकर ठूंसा जाता है। हेमामालिनी, जया बच्चन और रेखा की अलग अलग पार्टियों की तिकड़ी में राज्यसभा को स्टूडियो बना दिया गया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या प्रगतिशीलता से इनका क्या रिश्ता है। गांधी, नेहरू की परंपरा में रेखा संसद गईं।
 
गोविंदा की हाजिरी नहीं होती थी। अंगरेजों के खेल क्रिकेट के सिपहसालार सचिन तेंदुलकर को भारत र} बना दिया गया। संसद में मौन और गौण रहते। भारत र} फीस लेकर विज्ञापन करते रहे। इन्कम टैक्स बचाने के फेर में नोटिस भी आते रहे। संसद के बादशाह करोड़ों रुपए बर्बाद करके मनोरंजन, व्यंग्यबाण, फब्तियां, हाथापाई और गाली गलौज के दृष्य किसी स्टंट फिल्म की तरह उत्पादित करते रहते हैं। मंत्रिपरिषद की सामूूहिक अवधारणा अंगरेज की नकल करते लिखी गई। फिर भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अपनी जागीर के तानाशाह हैं। भृकुटि टेढ़ी हुई। असहमत मंत्री का भाग्य अस्त हुआ। कोई नहीं जानता शीर्ष पार्टियों के शीर्ष नेता कितना पढ़े हैं। उनकी डिग्रियां सूचना के अधिकार के तहत भी नहीं मिलती। लिखा भाषण पढ़ते हैं। अभिनय करते हैं। मानो अंदर से उच्छवास ट्यूूबवेल के पानी के धार की तरह फूट रहे हों। 
 
न्यायपालिका बौद्धिक पांडित्य का शरणालय रही है। उसमें नीबू के पुराने अचार की तरह गुण नहीं फफूंद लगे आम के अचार की महक आने लगी है। ऊंची अदालतों के न्यायाधीशों पर घूसखोरी और यौन शोषण के आरोप लगे हैं। लाखों रुपया निजी कारोबारियों की अंशधारी पूंजी बनता है। सरकारी आवास से उनके वंशज व्यापार करते हैं। परिवार और चहेतों को अमीर होने का अचानक पारस पत्थर मिल जाता है। कोई जांच की व्यवस्था ही नहीं है। नागनाथ और सांपनाथ संस्थाओं की लड़ाई में जहर जनता को पीना पड़ता है। जनता डॉक्टर और हकीम नहीं मिलने के कारण ओझा बने सत्ता के दलालों के पास जाती है। वे उसका अधमरा इलाज करते हैं।
 
सत्ता के दलाल न्यायाधीशों, मंत्रियों और अफसरों के पास मूंछ एंेठते हैं। सात्विक और चरित्रवान लोग दुम दबाए अपनी इज्जत बचाते घरों में दुबक रहे हैं। हर शरीफ आदमी समाज विमुख हो रहा है। सत्ता यही तो चाहती है। देश लालबुझक्कड़ों के कब्जे में है। प्रशासन मीनाबाजार है। बचपन में मीनाबाजार देखने जाते। यह रिकॉर्ड लाउडस्पीकर पर सुनते। बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया। कि जिस जालिम ने तड़पाया उसी पर मुझको प्यार आया। 

 

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