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बलूचिस्तान पर चुनौतीपूर्ण कूटनीति

By डॉ. रहीस सिंह | Sep 18, 2016 |
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 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2016 को लाल किले के प्राचीर से गिलगित और बाल्टिस्तान के साथ-साथ बलूचिस्तान पर पाकिस्तान को संदेश दिया था, वह अब भारत की सामरिक कूटनीतिक का अहम हिस्सा बनता दिख रहा है। इससे सम्बंधित हालिया उदाहरण यह है कि भारत ने पहली बार इंटरनेशनल फोरम पर बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया। जेनेवा में यूनाइटेड नेशन्स ह्यूमन राइट्स काउंसिल के 33वें सेशन में भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाक और उसके कब्जे वाले कश्मीर में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। पाकिस्तान ऐसा देश है जो बड़े सोच समझकर बलूचिस्तान और पीओके के साथ अपने ही लोगों के ह्यूमन राइट्स को कुचल देता है। 
 
विशेष बात यह रही कि इसी बीच न्यूयार्क में यूएन मुख्यालय के बाहर फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट ने पाक के खिलाफ प्रदर्शन किया व बलूचिस्तान दूसरा बांग्लादेश का नारा भी गूंजा। इन गतिविधियों को देखते हुए कुछ सवाल बेहद अहम हैं। प्रथम यह कि क्या वास्तव में भारत सरकार बलूचिस्तान में 1971 के इतिहास को दोहराना चाहती है? द्वितीय- क्या भारत ने बलूचिस्तान की स्थितियों को आकलन सम्पूर्णता के साथ कर लिया है? तृतीय- क्या बलूचिस्तान में इस समय उसी तरह की सक्षम लीडरशिप है, जैसी 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में थी? चतुर्थ- क्या बलूचिस्तान में मुक्ति वाहिनी जैसा लड़ाकू बल बलूचिस्तान में इस समय प्रभावशाली स्थिति में है या फिर भारत को इस दिशा में अभी काफी काम करने की जरूरत है? अंतिम सवाल यह है कि यदि भारत इस दिशा में कोई कदम उठाता है, तो अंतर्राष्ट्रीय मंच और वैश्विक शक्तियां उसे किस तरह से लेंगी या इसके लिए भारत की कूटनीतिक तैयारी कितनी है? 
 
बलूचिस्तान के हालात 1947 में या फिर 1973 में जो थे, आज भी कमोबेस वैसे ही हैं, विद्रोह की चिंगारी बरकरार है। इसका फायदा भारत उठा सकता है। पर उसे चीन-पाक एंगल की ताकत को परखना होगा। चीन भारत संग खड़ा नहीं होगा। ऐसे में बलूचिस्तान में 1971 का इतिहास दोहराना जोखिम भरा व चुनौतीपूर्ण होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वक्तव्य के समय से लेकर अब तब बलूचिस्तान पर जो डेवलपमेंट हुआ है, उसमें एक पक्ष यह है कि भारत ने जेनेवा में यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल में पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया। 
 
भारत ने कहा कि कश्मीर में अशांति का मुख्य कारण सीमा पार से होने वाला आतंकवाद है। पाकिस्तान आतंक को स्पन्सर करता है और वहां की अवाम को भड़काता है। पाकिस्तान का खराब ट्रैक रिकार्ड पूरी दुनिया जानती है। दूसरा विकास यह दिखा कि बलूचिस्तान सर्मथकों और कार्यकर्ताओं को मनोबल बढ़ाने में भारत सफल रहा है। यही वजह है कि न्यूयॉर्क में बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन बंद करो लूचिस्तान में बमबारी बंद करो और बलूचिस्तान पाकिस्तान नहीं अथवा भारत बलूचिस्तान की मदद करो यूएन, यूएन कहां हो तुम,पाकिस्तान को दान देना बंद करो बलूचिस्तान दूसरा बांग्लादेश है ज़ैसे नारे लगे। 
 
तीसरा विकास इस सम्भावना में निहित है कि सितंबर के आखिर में यूएन जनरल असेंबली के दौरान न्यूयार्क में भारत-अमेरिका और अफगानिस्तान आतंकवाद के मुद्दे पर (ना कि बलूचिस्तान के मुद्दे पर) पाकिस्तान को तीन तरफ से घेरने युक्ति तलाशने का प्रयास करेंगे। हालांकि ओबामा प्रशासन बलूचिस्तान पर भारत के रुख का सर्मथन नहीं करेगा लेकिन यह संभव है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर वह भारत के साथ आ जाए क्योंकि पिछले दिनों अमेरिका ने एफ-16 फाइटर विमान की बिक्री रोकने के साथ पाक को आतंकवाद के खिलाफ अभियान के लिए 30 करोड़ डलर की वार्षिक मदद रोक दी है। इन वैकासिक पक्षों के बावजूद बलूचिस्तान के कुछ और पहलू भी हैं, जिन पर ध्यान देना रणनीतिक तैयारी के लिहाज से जरूरी होगा। 
 
भारत ने यदि इस स्तर की रणनीति का खुलासा नवाब अकबर खान बुगती के जमाने में किया होता, तो यह माना जा सकता था कि भारत की तरफ से दिए जा रहे संदेश निर्णायक हैसियत प्राप्त करने में सफल होंगे, लेकिन मौजूदा समय में इस दिशा में पूर्णत: आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। हालांकि बलूचिस्तान एवं पाकिस्तान में वह खाई, जो नवाब बुगती की हत्या के समय निर्मित हुई थी, न केवल मौजूद है बल्कि और गहरी व चौड़ी हो गई है। इसलिए डिवाइड डिप्लोमैसी के लिए वहां स्पेस तो है। उल्लेखनीय है कि 26 अगस्त 2006 को बलूचिस्तान की भम्बोर पहाड़ियों में जनरल मुशर्रफ की फौज ने 80 वर्शीय बलूच नेता और बलूचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री नवाब अकबर बुगती की हत्या कर दी थी। 
 
उस समय पाक मीडिया ने बुगती की मौत को एक राजनीतिक दु:स्वप्न करार देते हुए कहा था राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान में बैठकर नवाब बुगती को खत्म करने का निर्णय लेने वाले राजनीतिज्ञ, इतिहास और राष्ट्रवाद की ताकत से अनजान हैं। बुगती की हत्या के बाद यह कयास भी लगाया जाने लगा था कि बलूचिस्तान में 1971 के पूर्वी पाकिस्तान का इतिहास दोहराया जा सकता था। लेकिन बाहरी सहयोग के अभाव में विद्रोहात्मक भावनाएं कमजोर पड़ती गईं जबकि बुगती की हत्या ने बलूचिस्तान और पाकिस्तान के बीच विभाजन रेखा खींच दी थी। 
 
जहां तक मौजूदा वक्त का सवाल है तो बलूचिस्तान के प्रमुख अलगाववादी नेताओं में एक हैं ब्रहमदाग बुगती जो नवाब अकबर खान बुगती के पोते हैं, दूसरे हरबयार मरी हैं और तीसरे करीमा बलोच। इनमें से ब्रह्मदाग स्विटजरलैंड में हैं हरबयान मरी ब्रिटेन में और करीमा बलोच कनाडा में हैं। प्रबल विद्रोहात्मक कार्रवाई के लिए जरूरी है कि ये नेता बलूचिस्तान में रहें या फिर भारत उन्हें भारत राजनीतिक शरण देकर भारत से ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब बलूचिस्तान में ऐसी कार्रवाई संभव नहीं है जो 1971 के इतिहास को दोहराने में सफल हो जाए।
 
बलूच अभी भी उन्हीं विचारों-उद्देश्यों से सम्पन्न हैं जो 1947 में या फिर 1973 में थे, लेकिन स्थितियां अब बदल गई हैं। इन बदली स्थितियों का फायदा भारत उठा सकता है। पर उसे चीन-पाक एंगल की ताकत को परखना होगा। चीन भारत संग खड़ा नहीं होगा। ऐसे में बलूचिस्तान में 1971 का इतिहास दोहराना जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण भी होगा। लेकिन एक ताकत के रूप में चुनौती लेनी होगी। 
 
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