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पिता-पुत्र में वर्चस्व की जंग

By haribhoomi.com | Oct 26, 2016 |
akhilesh
उत्तर प्रदेश में सत्तानशीन समाजवादी पार्टी आजकल अपने राजनीतिक विभाजन के कगार पर खड़ी है। डॉ. राममनोहर लोहिया को अपना आदर्श निरुपित करने वाले मुलायम सिंह ने सामंती तौर तरीकों से समाजवादी पार्टी का सदैव संचालन किया है। समाजवादी पार्टी को अपने परिवार और कुनबे की पार्टी के तौर पर निर्मित करने वाले मुलायम सिंह आजकल पारिवारिक अंतर्कलह और अंतरद्वंदों में बुरी तरह से उलझकर रह गए हैं। आचार्य नरेंद्रदेव, डा. लोहिया और चौधरी चरणसिंह का राजनीतिक उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाले मुलायम सिंह ने भारत के सोशलिस्ट आंदोलन की परंपरागत नैतिकता, शुचिता और शुद्धता कितना निर्वहन किया है, वह तो इस तथ्य से प्रमाणित हो जाता है कि छोटे लोहिया जनेश्वर मिर्श, मोहन सिंह और ब्रजभूषण तिवारी सरीखे तपे तपाए समाजवादियों की पांतों में मुलायम सिंह ने उत्तरप्रदेश के कुख्यात माफिया गिरोहों के सरगनाओं को साथ लाकर पार्टी में बाकायदा बड़े पदों पर आसीन कर दिया। राजनीतिक पहलवानी के दांव पेचों में माहिर रहे मुलायम सिंह का कड़ा मुकाबला अब राजनीतिक कुश्ती में अपने मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव के साथ हो रहा है।
 
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में शानदार बहुमत के साथ उत्तरप्रदेश में सत्तासीन होने वाली समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री को तौर पर अखिलेश यादव के मार्ग को स्वयं मुलायम सिंह ने प्रशस्त किया था। मुलायम सिंह उस वक्त देश का प्रधानमंत्री बन जाने का सपना अपनी आंखों में संजोए हुए थे। मुख्यमंत्री बन जाने से पूर्व समाजवादी पार्टी के युवा नेता के तौर पर अखिलेश यादव ने जब डीपी यादव सरीखे माफिया डॉन को समाजवादी पार्टी में दाखिल नहीं होने दिया था, तभी से अखिलेश के राजनीतिक तेवर मुलायम सिंह से कुछ अलग प्रतीत होने लगे थे। यूपी के युवा वर्ग ने जातिवादी समीकरणों से बहुत ऊपर उठकर विधानसभा चुनाव में अखिलेश को जबरदस्त सर्मथन प्रदान किया था। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद अखिलेश समाजवादी पार्टी की शासन संस्कृति को कदाचित परिवर्तित नहीं कर सके। प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अतिरिक्त आजम खान, शिवपाल सिंह, मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश शासन-सत्ता के सशक्त केंद्र बने रहे। प्राय: कहा जाने लगा कि प्रदेश में एक नहीं वरन चार-चार मुख्यमंत्री विद्यमान है। 
 
एक मुख्यमंत्री को तौर पर अखिलेश अपनी राजनीतिक ताकत का कभी समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाए। लालीपॉप की तर्ज पर लैपटॉप वितरित करके अखिलेश पोपुलिस्ट तौर तरीकों से अपना राज-काज को संचालित करते रहे। वर्ष 2014 को लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की 80 में से 73 लोकसभा सीटों पर फतहयाब होकर इतिहास रच दिया। तभी से अखिलेश यादव को अपनी राजसत्ता की नैया डगमगाती हुई प्रतीत होने लगी। अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक सलाहकार के तौर पर अमेरिका की हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग को नियुक्त किया। प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग हिलेरी क्लिंटन के राजनीतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। इस तरह से अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह के आभा-मंडल से बाहर निकल कर अपने ही दम पर 2017 के विधानसभा चुनाव की रणनीति का सृजन करना प्रारंभ कर दिया। मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय का पुरजोर विरोध अखिलेश ने किया, किंतु पूर्णत: नाकाम रहे। 
 
उम्र के इस पड़ाव पर मुलायम सिंह अपने पुराने राजनीतिक तौर तरीकों से तो निजात पा नहीं सकते हैं और अखिलेश यादव मुलायम सिंह की राजनीतिक रणनीति पर आगे चलना नहीं चाहते हैं। मुलायम सिंह ने यहां तक कह दिया कि अखिलेश तुम्हारी औकात ही क्या है। चौधरी चरणसिंह का सच्चा शिष्य क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए ऐसे अल्फाज का इस्तेमाल कर सकता है? भले ही वो उसका पुत्र ही क्यों न हो। मुलायम सिंह का यह इल्जाम कि अखिलेश तुम जुआरियों और शराबियों से घिर गए हो कहां तक वाजिब है? जबकि अपने राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह सदैव माफिया सरगनाओं से घिरे रहे हैं। मुलायम सिंह ने अभी तक जिन स्वेच्छापूर्ण सामंतशाही तौर तरीकों से समाजवादी पार्टी का संचालन किया है, उनको अब अखिलेश ने खुली चुनौती पेश की है। भ्रष्टाचार के इल्जामात से घिरे मंत्रियों को बर्खास्त किया है। अपनी राजनीति छवि को उज्ज्वल बनाने के लिए लालायित अखिलेश को और अधिक हौसले के साथ आगे बढ़ना होगा। यह ठीक है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में शासन-सत्ता की बाजी अखिलेश को हाथों निकल सकती है, किंतु भविष्य तो विकासवादी और स्वच्छ राजनीति में ही निहित है। 
 
जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति वस्तुत: देश और प्रदेश दोनों के लिए ही घातक सिद्ध हुई है। किसान और मजदूरों के हक की खातिर संघर्ष की हुंकार भरने वाले समाजवादी किस तरह से जातिवाद और सांप्रदायिकता को प्रबल अस्त्र बनाकर सत्तालोलुपता की दलदल में धंसते चले गए कि समस्त नैतिकता और शुचिता का माफिया सरगनाओं के हाथों हनन हो गया। समाजवाद की सच्ची राह का अनुगमन करने वाले योद्धाओं ने किसान-मजदूर जनमानस को एकताबद्ध करने के लिए जातिवाद और सांप्रदायिकता से सदैव कड़ा लोहा लिया है। अत्यंत गौरवशाली इतिहास वाला समाजवादी आंदोलन उत्तर प्रदेश में इस कदर पतित परिणति तक पंहुचेगा किसी ने कभी सोचा न था, किंतु अब फिर से उम्मीद की किरण उभरी है, जो केवल अप्रतिम हौसले और धैर्य से परवान चढ़ सकती है।
 
समाजवादी पार्टी में विद्यमान माफिया ताकतें कुचलकर रख दी जाएं और गुंडा-राज का पूर्णत: खात्मा कर दिया जाए। मुलायम सिंह की राजनीतिक कार्य-संस्कृति ने प्रदेश में कानून व्यवस्था को गहन-गंभीर क्षति पंहुचाई है। अखिलेश ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था सुधारने की आधी अधूरी कोशिशें की, किंतु पूर्णत: नाकाम बने, रहे क्योंकि शासन सत्ता अनेक केंद्रों के मध्य विभाजित बनी रही। अब अपने शासनकाल के आखिरी दौर में अखिलेश ने राजनीतिक अंगड़ाई ली है, हांलाकि अब तो बहुत देर हो चुकी है, किंतु फिर भी देर आए दुरुस्त आए। भविष्य में माफिया मुक्त समाजवादी राजनीति भविष्य में नौजवान अखिलेश के लिए शानदार राह प्रशस्त कर सकती है। 
 
अखिलेश ने मुलायम सिंह की राजनीति से अलग और मुक्त होकर यदि डा. लोहिया और चरणसिंह के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प ले लिया है, तो उनको आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। प्रदेश की सभी देशभक्त ताकतें जो सांप्रदायिकता और जातिवाद से लोहा लेकर किसान-मजदूरों के हक का राज-काज स्थापित करना चाहती हैं वे सभी अखिलेश के साथ खड़ी हो सकती है, किंतु इसके लिए अखिलेश को मौकापरस्त जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति का दामन पूर्णत: छोड़ना होगा।
 
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