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अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट में 8 फरवरी को होगी अगली सुनवाई, ये है वजह

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Dec 5 2017 5:26PM IST
अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट में 8 फरवरी को होगी अगली सुनवाई, ये है वजह

बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं वर्षगांठ से ठीक एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टाल दी है। पिछले सात साल से यह मामला अटका हुआ है। 

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, अशोक भूषण और अब्दुल नजीर की पीठ ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 8 फरवरी 2018 को होगी। सभी दस्तावेजों के साथ पेश हों।

अपडेट-

कोर्ट में सिब्बल ने कहा कि  2019 जुलाई तक सुनवाई को टाला जाना चाहिए

कपिल सिब्बल ने कहा कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे में है, उनके घोषणा पत्र का हिस्सा है इसलिए 2019 के बाद ही इसको लेकर सुनवाई होनी चाहिए

सिब्बल ने कहा कि रिकॉर्ड में दस्तावेज अधूरे हैं

2019 के आम चुनाव के बाद हो इसका फैसला: सिब्बल

सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने मांग की

कोर्ट में अब अगली सुनवाई 8 फरवरी 2018 को होगी

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए शुरू हुआ हवन

गिरिराज सिंह का कपिल सिब्बल पर निशाना

सुप्रीम कोर्ट में सुन्नी वक्फा बोर्ड के वकील हैं कपिल सिब्बल

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू

बरी मस्जिद के मुख्य मुद्दई इकबाल अंसारी का कहना है कि जो भी कोर्ट का फैसला होगा वो उन्हें मान्य है।

हिंदू संगठनों की दलील

1. श्रीरामलला विराजमान और हिदू महासभा आदि ने दलील दी है कि हाईकोर्ट ने भी रामलला विराजमान को संपत्ति का मालिक बताया है। 

2. वहां पर हिदू मंदिर था और उसे तोड़कर विवादित ढांचा बनाया गया था। ऐसे में हाईकोर्ट एक तिहाई जमीन मुसलमानों को नहीं दे सकता है।

3. यहां न जाने कब से हिंदू पूजा-अर्चना करते चले आ रहे हैं, तो फिर हाईकोर्ट उस जमीन का बंटवारा कैसे कर सकता है?

मुस्लिम संगठनों की दलील

1. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने अयोध्या में 1528 में 1500 वर्गगज जमीन पर मस्जिद बनवाई थी। 

2. इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता है। मस्जिद वक्फ की संपत्ति है और मुसलमान वहां नमाज पढ़ते रहे हैं। 

3. 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात हिदुओं ने केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्तियां रख दीं और मुसलमानों को वहां से बेदखल कर दिया।

7 साल से है सुप्रीम कोर्ट में मामला

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुन्नी वक्फ बोर्ड 14 दिसंबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। फिर एक के बाद एक 20 याचिका दाखिल हो गईं। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगा दी। 

लेकिन सुनवाई शुरू नहीं हुई। इस दौरान 7 चीफ जस्टिस बदल गए। सातवें चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने इस साल 11 अगस्त को पहली बार याचिका लिस्ट की पर सुनवाई के लिए तैयार हुए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट सुना चुका है फैसला

28 साल सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो एक के बहुमत से 30 सितंबर, 2010 को जमीन को तीन बराबर हिस्सों रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बांटने का फैसला सुनाया था। 

हालांकि, हाईकोर्ट के खिलाफ सभी पक्षकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2011 को अपीलों को विचारार्थ स्वीकार करते हुए मामले में यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था, जो यथावत लागू है।

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