साहि‍त्‍य

पति-पत्नी की नोक-झोंक दर्शाता एक व्यंग्य 'मनसुखलाल का वसंत'

By पूरन सरमा | Feb 05, 2017 |
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मनसुखलाल ने आंखें खोलीं और बुदबुदाए, ‘शर्मा क्यों पतझड़ में हाथ डाल रहे हो। तुम्हारी भाभीजान क्या जाने यह मस्ताना वसंत होता क्या है? उसके भरोसे रहता तो सूखकर कांटा हो जाता। मैंने अपना वसंत खुद खोजा है शर्मा।’
 
वसंत का पता सबसे पहले मुझे ही चलता है। इधर चिड़ियाएं भी तिनके उठा-उठाकर घोसला बनाने लगी हैं। बदन में झुरझुरी और अजीब सी थिरकन दोनों एक साथ हुई तो मैं मन-ही-मन बुदबुदाया, ‘ओ माई गॉड, तुम फिर आ गए माई डियर वसंत।’ वसंत बोलता नहीं। बस हंसता है और अहसास जगाता है भीतर-ही-भीतर। वसंत का अपना आलम, जहान और संसार है, जब वह फूलों, पेड़-पौधों और पत्तों में ताजगी भर देता है। यही ताजगी इस बार उसने मेरे पड़ोसी मनसुखलाल में भरी तो वे उचकते फिरे। पीले कपड़े पहने अपने पीले दांतों से खिलखिलाए तो मैंने कहा, ‘अमां मनसुख जरा बताओ तो तुम्हें वसंत का पता कैसे चला?’
 
 
वे बोले, ‘पहले तुम बताओ, तुम्हें कैसे चला?’ तनिक लजाकर वे बोले तो मैंने कहा, ‘इसमें लजाने और शरमाने की क्या बात है। मैं तो वसंत का आथेंटिक राइटर हूं। विगत पच्चीस वर्षों का इसके बारे में मेरा मौलिक अनुभव है। इसके आने के महीने-दो-महीने पहले ही मेरे मन में यह कुलांचे मारने लगता है। दो माह पहले लिखता हूं वसंत पर, तब छप पाता है इस मौसम में, इसलिए इसका पता मुझे सबसे पहले लग जाता है। अब भला तुम बताओ वसंत का राग क्या है?’
 
मनसुखलाल ने आंखों को बंद किया, वसंत को जीवंत कर बोले, ‘शर्मा रहने दो, मुझसे मत पूछो इस निगोड़े वसंत के बारे में।’ ‘कमाल करते हो यार। मुझसे पूछ लिया और खुद छिपाते फिरते हो। देखो बता दो वरना हम भाभीजान से पूछ लेंगे।’ मैंने कहा। मनसुखलाल ने आंखें खोलीं और बुदबुदाए, ‘शर्मा क्यों पतझड़ में हाथ डाल रहे हो। तुम्हारी भाभीजान क्या जाने यह मस्ताना वसंत होता क्या है? उसके भरोसे रहता तो सूखकर कांटा हो जाता। मैंने अपना वसंत खुद खोजा है शर्मा।’
 
‘वही तो मैं पूछ रहा हूं। आखिर तुमने वसंत को इस पचास वर्ष की आयु में भी कैसे सहेजे रखा है? ज्यादा बेताब मत करो भाई। खोलो वसंत के रहस्यों की पर्तों को।’ मैंने कहा तो मनसुखलाल ने तगड़ी अंगड़ाई मारी और उबासी के लिए मुंह खोला तो एक पल के लिए मैं घबरा गया। फिर मैं संभलकर बोला, ‘क्यों क्या बात है? तुम शरीर को भयंकर आकार-प्रकार क्यों देते जा रहे हो। यह परम मनोहर वसंती हवा की चुभन को क्या ठीक प्रकार से महसूस नहीं कर रहे?’ मनसुखलाल ने पीले-पीले दांत इस बार पूरे दिखाए और कहा, ‘मैं कच्चा चबा जाऊंगा शर्मा।’ मैंने पूछा, ‘कैसे?’ मनसुखलाल ने चुप्पी साध ली। लंबी डकार लेकर बोले, ‘शर्मा तुमने कच्चे अमरूद नहीं खाए। बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं। वासंती बयारों के दिनों में मैं रोज कच्चे अमरूद खाता हूं।’
 
 
मैं बोला, ‘लेकिन विषयांतर हो रहा है मनसुखलाल। तुम्हारी बेखुदी से मैं पगला गया हूं। मैं पूछ रहा हूं वसंत का पता तुम्हें किसने बताया।’ वे बोले, ‘मेरी बेखुदी और तुम्हारा पागलपन दोनों मिलकर वसंत को जन्म देते हैं। ऐसा करो अपना कान मेरे पास लाओ। मैं तुम्हें बता दूंगा वसंत का पता कहां से चला।’ एक पल को मैं डर गया। मुझे लगा मनसुखलाल वसंत के खुमार में मेरा कान ही न चबा डालें। मैं बोला, ‘देखो यहां कोई नहीं है। आराम से बताओ वसंत का पता। मैं दूर से भी सुन लेता हूं। फिर तुमने शायद आज पेस्ट भी नहीं किया है। इसलिए भैया बता दो जो बताना है।’
 
मनसुखलाल की आंखों से चिंगारियां निकलने लगीं। वे खड़े हो गए तथा आकाश को घूरकर बोले, ‘आज मुझे कच्चे अमरूद नहीं मिले। कौन खिलाएगा ए आसमां मुझे कच्चे अमरूद!’ मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि आखिर मनसुखलाल बेतुकी हरकतें क्यों कर रहे हैं? तभी श्रीमती मनसुखलाल वहां आ गर्इं। मैंने कहा, ‘क्यों क्या आज मनसुख जी की तबियत ठीक नहीं है?’
 
वह हंसी और बोलीं, ‘वसंत आ गया है शर्मा जी, इनसे बात मत करो। खासतौर पर अपने कान को बचाकर रखना।’ फिर वह मनसुखलाल से बोलीं, ‘अजी वसंत को मारो गोली। सब्जी ले आओ। पकड़ो ये थैला।’ प्रसन्नता से मनसुखलाल ने थैला ले लिया और और नाचते-कूदते सब्जी मंडी की ओर प्रस्थान कर गए। सब्जी मंडी से लौटे तो उनका भूगोल बदल गया था। रिक्शा में अधमरी अवस्था में आए। उनके मुंह पर चोट के निशान थे। मैंने कहा, ‘ये क्या हुआ?’ वे बोले, ‘अब तो चल गया न वसंत का पता। वसंत के मारे को मारा लोगों ने पागल समझकर। वसंत में यह नौबत आ जाए तो वसंत की सफलता संदिग्ध नहीं रहती। मैंने वसंत को सब्जी मंडी में देखा था। उसके बाद यह हादसा हुआ।’ 
 
 
मैंने सहारा देकर उन्हें रिक्शे से उतारा तो वे बोले, ‘घबराने की बात नहीं है। रिक्शे वाले को दस रुपए देकर विदा करो। मैं वसंत को ढ़ूंढ़कर ले आया हूं। तुम्हें भी बताऊंगा।’ मैं घबरा गया। मैंने रिक्शेवाले से कहा, ‘भाग लो, वसंत का वायरस फिर सक्रिय हो गया है। पिटने और पीटने की बेला ज्यादा दूर नहीं है।’
 
रिक्शेवाला घबराकर भाग लिया। मैंने भी दौड़कर अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया। इतना डरावना वसंत मैंने जीवन में पहली बार देखा था। मनसुखलाल ने खड़े-खड़े फिर अंगड़ाई ली और खाली थैला हवा में उड़ा दिया। वसंत मनसुखलाल की देह पर पूरी तरह सवार था और वे अपने मकान के बरामदे में बुरी तहर पसर गए। उन्हें इस हालत में देखकर मैंने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं। मुुझे लगा वसंत पहले मैंने नहीं, मनसुखलाल ने देखा है। वैसे भी वे उम्र में मुझसे बड़े हैं।
 
 
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