साहि‍त्‍य

पढ़िए चुनावी माहौल में एक व्यंग्य 'टीवी के बसंती'

By आलोक पुराणिक | Aug 27, 2016 |
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कुछ समय बाद पंजाब और यूपी के विधानसभा चुनाव होने हैं। पब्लिक जब फैसला करेगी, तब करेगी, टीवी चैनलों ने अभी से फैसले शुरू कर दिए हैं। कौन बनेगा मुख्यमंत्री, कौन बनेगा विधायक टाइप कार्यक्रम टीवी पर लगातार आ रहे हैं। वैसे इस तरह के पॉलिटिकल कार्यक्रम कम से कम भानगढ़ के भूत चंपा नदी की चुड़ैल के कार्यक्रमों से मुक्ति दिला देते हैं। चुड़ैल-भूतों की जगह नेता घेर लेते हैं। नेताओं का यह योगदान कम है क्या कि वो भूत-चुड़ैलों से मुक्ति दिलवा रहे हैं। यद्यपि उनमें से अधिकांश के करतब बाद में वैसे ही डराते हैं, जैसे भूत चुड़ैलों के कारनामे डराते हैं।
 
चपर-चपर, कचर-कचर नान-स्टाप बक-बक-इधर टीवी न्यूज-चैनलों को देखकर मुझे शोले फिल्म की बसंती याद आती है। कुछ एकाध चैनल तलाश रखे हैं मैंने, जहां बसंतीपना कम होता है, हिस्ट्री चैनल, जानवरों वाले चैनल पर शोर उतना नहीं होता। शेर-भालू शांत रहते हैं, नेताओं और एंकरों से आप ये उम्मीद नहीं रख सकते। राज्यों के आगामी चुनावों के चलते अब लगभग हर चैनल बसंतीपने से भचाभच हो लिया है। उस चैनल से कूदकर दूसरे चैनल पर जाता हूं, तो वही बसंती मिलती है, जो पुराने चैनल पर चपर-चपर कर रही थी। उस चैनल पर लाइव बसंती थी, इस पर रिकॉर्डेड बसंती है। तकनीक ने बसंती को बहुमुखी-बहु उपस्थित कर दिया है। बसंतियां आती हैं, कचर-कचर किए जाती हैं। 
 
बिना इस बात की चिंता किए हुए कि उन्हें कोई सुन रहा है या नहीं। हमारी कोई सुन भी रहा है या नहीं, यह चिंता करने वाला विद्वान-संवेदनशील तो हो सकता है, पर नेता नहीं। नेता वही पक्का है, तो र्शोता की चिंता किए ठेले जाता है। कई बसंतियां ऐसी हैं जो एकाध महीने में ही अपनी पुरानी बातों की उलटी बातें करने लगती हैं। पहले वो केजरीवालजी को जिता रही होती हैं, अब केजरीवालजी को हरा रही होती हैं। बसंती टाइप एक्सपटरें से कोई पूछे कि कुछ समय पहले तो आप ऐसा नहीं वैसा कह रहे थे, तो उनका जवाब हो सकता है कि हमें तो याद नहीं कि हम क्या कह रहे थे और सच में अधिकांश दर्शकों को भी याद नहीं कि वो क्या कह रहे थे। वो सिर्फ कहे चले जाते हैं, उन्हे कोई सुनकर याद रख रहा है या नहीं, यह चिंता उनकी नहीं है।
 
वैसे, अगर उनकी बातें लोग याद रखने लग जाएं, तो दिक्कतें ज्यादा हो जाएगी। नेताओं की तरह सीनियर एंकरों की धरपकड़ भी हो लेगी कि आप तो यूं ही कुछ भी कह मारते हैं। खैर चुनाव के करीब दिनों में सीनियर बसंतियां बहुत बिजी होती हैं। नई बसंतियों की उड़ने लग जाती है और नवोदित बसंतियों को उगने का मौका मिलता है। अभी उस दिन एक टीवी चैनल से फोन आया मेरे पास, संवाद इस प्रकार हुआ- जी चुनावी चर्चा में हमारे टीवी चैनल में आप आइए डिस्कशन के लिए। पर यह विषय मेरे ज्ञान-अध्ययन का क्षेत्र का विषय नहीं है। जी, तो क्या आप समझते हैं कि जिन्हे हम बुलाते हैं, वो सारे ज्ञानी लोग हैं। तो मतलब आपके उन्हीं लोगों को चुन-चुनकर बुलाते हैं, जो अज्ञानी हों। 
 
जी आप बात को उलटा समझते हैं, यह पूरा सच नहीं है। इसलिए तो आपको बुला रहे हैं। गंभीर बात करने पर हमारा चैनल एक्सपर्ट का चालान कर देता है। एकाध टीवी डिस्कशन में जाकर एक्सपर्ट होने की तरकीब सीख गया। अब किसी मीटिंग-पार्टी में होता हूं, तो लोग मुझसे एक्सपर्टाना बरताव की उम्मीद करते हैं। मुझे अब डिस्कशन की तरकीब आ गई है। डिस्कशन यूं चलता है-इस बार तो पंजाब में केजरीवाल की हवा है। मैं-हां, हां बहुत हवा है। हवा तो वैसे बादल-मोदी की भी कम नहीं है। हां, हां, बादल-मोदी की भी हवा कम नहीं है। भई कमाल करते हैं आप साफ नहीं बताते हैं कि किस की हवा है। आप तो एक्सपर्ट हैं। दोनों की हवा है, देखिए। पर जीत कौन रहा है। जीतेगा वही, जिसे पब्लिक जिताएगी। अमा आप एक्सपर्ट हैं, कुछ साफ-खुलकर बताइए। देखिए, लोकतंत्र ही जीतेगा, इस मुल्क में लोकतंत्र ही विजया होगा। कमाल करते हैं, पता आपको कुछ नहीं है, बता सब कुछ रहे हैं। जी मैं टीवी वाला एक्सपर्ट हूं । थैंक गाड, उसने मुझे बसंती नहीं कहा।
 
 
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