साहि‍त्‍य

कर्मचारियों की खुशियों को दर्शाता व्यंग्य 'सर्वर डाउन है'

By संदीप सक्सेना | Jan 15, 2017 |
hindi
चहुंओर के आॅलरेडी डाउन-डाउन से पसरे माहौल में सोने में सुहागा सरीखे, सर्वर जी डाउन क्या हुए या फिर उनकी प्यारी बहना कनेक्टिविटी नदारद क्या हुई कि सामने बैठे काम करने वाले-वालियों के चेहरे की चमक देखने के काबिल हो जाती है। और सामने परंपरागत से मुरझाए चेहरों को लिए जनता बेचारी मजबूरी की नियति को लिए ताकती रहती है। अब शब्द तो भईया शब्द ही होते हैं-इनकी गजब सी ताकत, कूव्वत और  प्रभाव से कौन इंकार कर सकता है। इंसानी जिंदगी में इनकी क्या अहमियत और खासुलखास जगह है, यह आप ज्ञानी जनों को हाईलाइट करके बयां करने की जरूरत नहीं लगती है जनाब! यह तो बिगड़ी को बना देते हैं, बने को बिगाड़ कर उसकी हर हद तक दुर्गति कर देते हैं और कभी-कभी तो हमारी आपकी रोजाना की जिंदगी के तौर-तरीकों का ही निर्धारण कर देते हैं। यही सब मिलकर ही तो शब्दों को कालजयी बना देते हैं। इन कालजयी से शब्दों की बिरादरी यकीनन ही बहुत लंबी-चौड़ी और दूर-दूर तक फैली हुई है। अब आप किसी भी ऐसे शब्द पर गौर फरमा कर देख लीजिए। उसकी ‘शल्य-क्रिया’ करके देख लीजिए तो आपकी धारणा को पुख्ता   होने में कोई देर नहीं लगेगी। अब जैसे कि इन शब्द महान पर ही गौर फरमाइए कि ‘सर्वर-डाउन है’ या ‘कनेक्टिविटी नहीं है’। जी हां जनाब...ये चंद ऐसे समय को जीत लेने वाले से शब्द हैं, जिनसे आज के दौर-ए-वक्त में हमारा-आपका और शायद सभी का सामना लाख न चाहने के बावजूद भी होता ही रहता है, ऐसा इस नाचीज का सौ फीसदी मानना है।
 
 
‘सर्वर’ और ‘कनेक्टिविटी’ आज की कंप्यूटरीकृत दुनिया और डिजिटली समाज के दो ऐसे मेंबर हैं, जिन्होंने इंसान नाम के दोपाया जीव को लख-लख नाच नचाया हुआ है और निरे दिनदहाड़े ‘ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार’ के दर्शन करा दिए हैं क्योंकि इनको इसी में आनंद की प्राप्ति जो होती है। अब सर्वर भइया और प्यारी-दुलारी कनेक्टिविटी बहना के बारे में क्या-क्या बयां किया जाए। जो भी जितना कुछ भी अर्ज किया जाए, वह भूमिका -मात्र ही साबित होगा, ऐसा तो सोलह आने पक्का मान कर चलिए जनाब। यह समझ और जान-मान लें कि दोनों विशुद्ध रूप से आज के समय के हिसाब से ढले हुए हैं और सही मायनों में एक-दूजे के लिए ही बने हैं। एक का स्वभाव ज्यादातर ‘डाउन’ रहना होता है, तो दूजे का पता ही नहीं रहता है कि न जाने कहां गुम रहकर विचरण करती रहती है। यानी कि कहीं भी रह सकती है, पर जहां वास्तव में रहना चाहिए-वहां इसके पांव नहीं टिकते हैं और चंचल हिरनी सी घूमती-फिरती रहती है। अब नहीं है, तो नहीं है कनेक्टिविटी जी, जो करना हो कर लो और आखिर कर भी क्या सकते हो आप भला। 
 
 
जब मूड बनेगा, जब चंचल चित को आराम करने का मन होगा तो स्थिर होकर फिर आ जाएगी कनेक्टिविटी। पर फिर कितनी देर टिकेगी इसकी कोई गारंटी नहीं, रोक सको तो रोक लो इस महाठगिनी कनेक्टिविटी महोदया को। दूसरी ओर इसके सर्वश्री भइया के तो कहने ही क्या, इनके ‘डाउन-डाउन’ रहने की आदत के आगे तो हर कोई हारा। सर्वर भइया का डाउन रहने सा मूड अपने यहां की ट्रेडिशनल ‘कार्य-संस्कृति’ को विकसित करने और दफ्तरों में काम न करना पड़े, यह चाहने वालों के लिए बहुत गजब का ‘टंच’ उपहार  सरीखी चीज के रूप में उभर कर सामने आया है। ऐसा मौजूदा हालातों को मद्देनजर रखते हुए आसानी से कहा-माना जा सकता है।  चहुंओर के आॅलरेडी डाउन-डाउन से पसरे माहौल में सोने में सुहागा सरीखे, सर्वर जी डाउन क्या हुए या फिर उनकी प्यारी बहना कनेक्टिविटी नदारद क्या हुई कि सामने बैठे काम करने वाले-वालियों के चेहरे की चमक देखने के काबिल हो जाती है। एक ठंडी सांस भरते हुए शान से ‘अंगड़ाई तोड़ने का’, ‘आॅफिशियली’ या फिर कह लें कि सरकारी तौर पर मौका मिल जाता है। और इसके ठीक विपरीत, सामने परंपरागत से मुरझाए चेहरों को लिए जनता बेचारी मजबूरी की नियति को लिए ताकती रहती है, क्योंकि सामने वाले के पास ब्रहमास्त्र जो होता है कि सर्वर डाउन है या फिर कनेक्टिविटी जी अपनी निर्धारित जगह से कहीं और  ही चलायमान हो चुकी हैं। 
 
 
मौजूदा हालातों के चलते यह आसानी से कहा जा सकता है कि अंग्रेजों के जाने के बाद जिस चीज ने अपने यहां लोगों को पूरी तरह अपना गुलाम बनाया हुआ है, वह सर्वर और उनकी बहना कनेक्टिविटी जी ही हैं। अब आप ज्ञानीजन ही समझ लें कि कैसे ये दोनों महान हस्तियां सबको अंगूठा दिखाते हुए अपनी अंगुलियों पर नाच नचा रही हैं कि अगलों के पास कार्यक्षमता है...काम  करने की। दो हाथ और बुद्धि भी है, पर मजबूर हैं इस दौर-ए-कंप्यूटर में, तभी तो ‘अंखियां हरिदर्शन की प्यासी’ स्टाइल में कंप्यूटर स्क्रीन को ताकती रहती हैं कि पता नहीं कब सर्वर जी का डाउन मूड ‘अप’ हो जाए या फिर उनकी गुमशुदा कनेक्टिविटी बहना तड़ से कट हो कर कल्याण कर दें। बहरहाल, इस ‘डाउन रहने’ और ‘न होने’ के तिलस्मी मकड़ जाल में उलझी हैरान-परेशान जनता पर इनकी कृपादृष्टि बनी रहे और उनके निगाह-ए-करम का प्रसाद मिलता रहे, सच्चे मन से यही दुआ करनी चाहिए। बाकी तो फिर ऊपर वाला सबका मालिक है ही, रहमो-करम के लिए...क्यों ठीक है न!
 
 
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