साहि‍त्‍य

व्यंग्य: फेसबुकिया पीढ़ी के लिए नव वर्ष की शुभकामनाएं

By राजा चौरसिया | Jan 01, 2017 |
satire
फेसबुकिया पीढ़ी विश करने की आड़ में अपनी गोटी फिट करने का जुगाड़ कर ही लेती है। ‘दिल को देखो चेहरा न देखो’ के स्थान पर ‘चेहरा देखो दिल को न देखो’ की सेलिब्रिटी प्रत्येक सिटी में दर्शनीय रहती है। सबके पास ढेरों शुभकामनाओं का बंपर स्टॉक रहता है। सड़कों पर हैप्पी न्यू ईयर लिखा नजर आता है, फिर भले ही बाद में उसको रौंदा जाता है। नए साल का उत्सव बहुत उल्लास से मनाने का क्रेज हर साल तेज होता जा रहा है। भावनाओं का अकाल होते हुए भी शुभकामनाओं की बाढ़ आधुनिकता के प्रति हमारे अति प्रेम का सटीक प्रतीक है। जिस प्रकार असली का विकल्प नकली है, उसी प्रकार हृदय के अभाव के चलते भाव का विकल्प शब्द है। दर्शन के देश में प्रदर्शन की हवा चल रही है। जिगर की जगह फिगर, आचरण की जगह आवरण और ‘हो’ की जगह ‘शो’ को ही प्राथमिकता देने की हमारी मानसिकता चाहने तथा सराहने योग्य है। जो दिखाऊ है, वही रिझाऊ है। आजकल टिकाऊ होना जरूरी नहीं है। फेस को विशेष स्पेस मिलना ही चाहिए।
 
हमें यह देख-सुनकर बड़ा अच्छा लगता है कि अंदर बूंद भर भी चाहत नहीं है मगर बाहर चाहत का समंदर झलका रहे हैं अर्थात अपार प्यार वाली शुभकामनाएं छलका रहे हैं। मन में शूल पर मुंह में फूल के हसीन सीन न्यू ईयर के जश्न के समय फुल फॉर्म पर रहते हैं। सच्चे अशुभ- चिंतकों और झूठे शुभचिंतकों में शुभकामनाओं की जी-तोड़ होड़ यह सिद्ध करती है कि बाजार ही हमेशा गुलजार रहता है। भीतर भड़ास या फांस होते हुए भी जबरन शुभकामनाएं उडेÞलना कमाल की बात है और इससे भी बड़ा कमाल उन्हें झेलना है। जितना तथाकथित प्यार होता है, उतना ही चमकदार होता है। अहसास के बिना भी अहसास का स्वांग आज कोई खामी नहीं बल्कि खूबी कहलाता है। दिल नहीं है, दिल की प्रदर्शनी तो है। यदि अट्रैक्टिव चीज क्षणिक तौर पर भी इफेक्टिव है तो यह भरपूर तसल्ली की बात है। मुंहदेखी की प्रीति की रीति-नीति के युग में जो हो रहा है, वह स्वीकार्य और अनिवार्य है। मुखौटा कल्चर गुलमोहर से भी मनोहर है। टाइल से चिकनी स्टाइल एवं स्माइल के साथ हैप्पी न्यू ईयर कहकर खुशियों को साझा करने की ड्रामेबाजी का धुआंधार होना अच्छे दिन आने का सबूत है। 
 
इस काबिलेगौर दौर में छाती से छाती और गले से गले लगाने के पुराने ढंग से कई गुना बढ़िया सोशल मीडिया वाला आइडिया है। यह शॉर्ट है, स्मार्ट भी है। यह भी मार्के वाली बात है कि जो दूसरों का धुआं देखने और दूसरों के तवे पर अपनी रोटियां सेंकने के लिए माहिर एवं जाहिर हैं, वे भी कह रहे हैं-‘मुसीबत की परछाइयां तक आपको छू न पाएं, हम खिचड़ी खाएं मगर आप खीर खाएं, आपके घर में खुशियां पलथी मारकर बैठ जाएं, आंखों जैसी आपकी इस जोड़ी के दिन फूलों जैसे महमहाएं, चिड़ियों जैसे चहचहाएं, आई लव यू के गीत गाएं और सालभर अपनी दाल गलाएं हमारी फुलवारी सी प्यारी आपको ढेर सारी शुभकामनाएं।’ अब हृदय स्मृति शेष रह गया है तो क्या हुआ। आज हार्दिकता की शोबाजी तो भरपूर है। नए साल की आड़ में स्वच्छंद होकर आनंद मनाने का यह उत्सव नवीनता से ओत-प्रोत रहता है।
 
नव वर्ष का हर्ष मनाने के लिए कच्ची पीने अर्थात ठर्रा पीने से जरा हटकर अंग्रेजी पर उतारू होना अपने आपमें आधुनिक विशेषण है। खाने-पीने से ज्यादा पीने-खाने पर जोर देना प्रगतिशीलता की शान है, पहचान है। वे कितने सहनशील हैं, जो नए-पुराने मीठे दुश्मनों की शुभकामनाएं, ग्रीटिंग आदि जबरन हंसते हुए स्वीकार करते हैं, धन्यवाद देते हैं और रिटर्न के रूप में ‘सेम टू यू’ कह लेते हैं। पहले हाय हैलो फिर आगे चलो, पर्याप्त है। 
 
यह दुनिया जितनी अनूठी है, उतनी झूठी है। लोकाचार अर्थात व्यवहार में वे लोग भी केले नजर आते हैं जो स्वभाव से करेले हैं। माहौल किसी मेकअप से कम नहीं होता है। हंसते-हंसते हमेशा हंसते रहना भी एक आर्ट है। दिखावट और बनावट के जमाने में बीमार होकर भी अनारदाने दिखना हुनर है। सेंटीमीटर लगाव न रहने पर भी मीटर से लेकर किलोमीटर बराबर लगाव जताना सबके वश की बात नहीं है।
 
नूतन वर्ष की तथाकथित शुभकामनाओं से कई लाभ अनायास प्राप्त हो जाते हैं। शुभचिंतक के रूप में पहली जनवरी से ही लोग प्रियजनों के घर में पधारते हैं, शुभकामनाएं देकर सत्कार के नाम पर जायकेदार नाश्ते का मजा मारते हैं। फोकटिया जुगाड़ की खुशी कई दिनों तक सीरियल की तरह चलती है। पीछे से गुलेल चलाने वाले भी सामने तेल-फुलेल की भाषा बोलते हैं। बॉडी लैंग्वेज तो ड्रामे जैसी भूमिका निभाती ही है। सोच ले अगर, ये चोचले न होते तो संसार असार होता।
 
हम दूसरे के सुख से दु:खी हैं और दु:ख से सुखी हैं। किसी की कमाई पर हमें जलन होती है। लेटेस्ट और बेस्ट सुख-सुविधाओं से लैस संबंधी भी फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं। इसके बाद भी नव वर्ष के उपलक्ष्य में उनके और ज्यादा मालालाल होने की कामना करना बड़ा ही साहसिक तथा अनिवार्य कार्य है। फेसबुकिया पीढ़ी विश करने की आड़ में अपनी गोटी फिट करने का जुगाड़ कर ही लेती है। ‘दिल को देखो चेहरा न देखो’ के स्थान पर ‘चेहरा देखो दिल को न देखो’ की सेलिब्रिटी प्रत्येक सिटी में दर्शनीय रहती है। सबके पास ढेरों शुभकामनाओं का बंपर स्टॉक रहता है। सड़कों पर हैप्पी न्यू ईयर लिखा नजर आता है, फिर भले ही बाद में उसको रौंदा जाता है।
 
नए साल की शुरुआत है, मुंह से फूलों की बरसात है, वाह क्या बात है। इस तथाकथित चाहत की चाशनी में डूबे शब्दों के फोकस में हमारे एक्शन से सेटिस्फेक्शन कुछ तो मिल ही जाता है। हाथी के दांत और मुखौटा कल्चर के चलते लेटेस्ट के प्रति टेस्ट होना सेंट-पर्सेंट प्रासंगिक है। प्रस्तुति से ही स्तुति होती है। फैंसी ड्रेस जैसा प्रजेंटेशन नयू ईयर को डियर बनाता है।
 
आशीर्वाद और चरण छू संस्कार का अंतिम संस्कार हो चुका है। अब पुष्प-वर्षण जैसा ऊपरी आकर्षण ही वांटेड है। काया की छाया की तरह घर में रहने वाला बेचारा मिस्टर अपनी मिसेज को वार्म विशेज, धनुष जैसा बनकर नव वर्ष की गिफ्ट सहित मुस्कुराते हुए प्रदान कर रहा है, ‘तुम डे नाइट एयर ग्रीन हसीन रहो। किसी की तुमको नजर न लग पाय तुमको हमारी उमर लग जाए। डार्लिंग, तुम मेरी खुशियों की मॉर्निंग हो।’
हमारे एक रसिया और मनबसिया दुबे जी हैं, जो उम्र के कैलेंडर के नवंबर में चलते हुए भी मेल से ज्यादा फीमेल को ग्रीटिंग प्रदान करते हैं। वे अपनी ब्याही सालियों को ऊपरी लेकिन अनब्याही सालियों को भीतरी शुभकामनाएं देकर स्वयं को विशेष चैतन्य तथा धन्य करते हैं।
 
मन में कटुता रहते हुए भी बोलने में पटुता अति आवश्यक है। लोकाचारी लाचारी भी कोई चीज होती है। पानी में रहकर मगर से बैर सरासर नादानी है। जस में तस की तर्ज पर चलने में कोई हर्ज नहीं है। आजकल रिटर्न कॉल के लिए मोबाइल से मिस कॉल की सुविधा चौबीस घंटे हैं। सारी दुनियादारी और रिश्तेदारी के नवीनीकरण हेतु ऐसी शुभकामनाएं सेतु के समान हैं।
 
साल जस के तस हैं तो भी खुशहाल दिखने की तमन्ना नए साल की ही देन है। हवा से भी लड़ने वाली पत्नी जब पति की ओर से उपहार सहित मंगलकामनाएं प्राप्त करती है तो हद से ज्यादा गद्गद् हो जाती है और उस दिन पति की दुर्गति नहीं हो पाती है।
 
अब तो आत्मीयता के प्रसंग बंद हो चुके नोट जैसे हो गए हैं। जैसी हवा चल रही है, वैसे आप भी चलिए। शुभकामनाओं के ऊपरी लेन-देन से नव वर्ष का हर्ष मनाइए। प्लास्टिक के फूलों पर इत्र का छिड़काव वांटेड है। यह क्या कम है कि नए साल की शुभकामनाओं के शो के समय नागफनी जैसी दुश्मनी भी हनी लगती है। हमारी ओर से भी गुलदस्ते सी प्यारी ढेर सारी शुभकामनाएं। असली खुशी नहीं है तो क्या हुआ। काम चलाने के लिए फसली खुशी बहुत बड़ी चीज है यार। जब से झूठ के अच्छे दिन आए हैं, तब से सच को टच तक करने का मन नहीं होता है। स्वांग की मांग को ध्यान में धरना है। अंदर से फुंफकार होते हुए भी नमस्कार करना है। यह मॉडर्न कैरेक्टर का विशेष फैक्टर है।
 
अगर भौतिकता के इस जमाने में नैतिकता के दौरे पड़ने लगें तो उनके शमन या दमन के लिए यह उक्ति अपने-आपमें युक्ति है, ‘जब दिल लगा गधी से तो परी किस काम की है।’ नई लहर कहती है-आर्टिफिशियल ही रियल है। यह फॉरमेलिटी किसी क्वालिटी से बढ़कर है। जब सब बढ़िया रंग-ढंग से चलता है ऊपर-ऊपर, तो फिर क्या करेंगे दिल-विल को छूकर भाई साहब। इन दिनों दंगल की बड़ी चर्चा है लेकिन हमारी यही कामना है कि सबका दांपत्य जीवन दंगलमय न होकर मंगलमय हो!
 
 
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