साहि‍त्‍य

दूसरों की पत्नियों से होली खेलने की व्यथा दर्शाता व्यंग्य- हाय होली के अरमान...

By अभिषेक अवस्थी | Mar 12, 2017 |
holi
बहुत अरमान संजोए थे। इस बार न सिर्फ अपने मोहल्ले, बल्कि दूसरे मोहल्ले की भाभियों को छेड़ने वाला साहसिक प्लान बनाया था। एकदम दूसरे देश की सीमा पे सर्जिकल स्ट्राइक जैसा प्लान। लुंगी डांस दिखाने का प्रोग्राम था। अपने ही वस्त्रों का हरण करने/करवाने के ख्वाब थे। घर को मदिरालय और भंग भंडार में परिवर्तित करने का स्वप्न चूर-चूर हो गया। सारे अरमान तीन-तेरह हो गए। बहुत बुरी तरह बुरा मान गए।
 
होली है। होली में बहक कर कुछ ऊंच-नीच लिख जाऊं तो ज्ञानी टाइप लोग बुरा न मानें। आपको तो पता ही होगा कि बुरा न मानो होली है। वरिष्ठ जी को कुछ गरिष्ठ लगे तो कनिष्ठ को क्षमा करें। न करेंगे तो भी चलेगा। बुरा न माने बस। क्योंकि होली है।
 
मिलिए अपने ज्ञानी जी से। नाम तो सुना ही होगा। ज्ञान का भंडार है, उनमें। ऐसा उन्होंने चतुर्दिश कहलवा रखा है। कई जगह तो खुद ही कहते पाए गए हैं। मुझे वे अव्वल दर्जे का मूर्ख मानते हैं। कोई नई बात नहीं। कई वरिष्ठ भी ऐसा ही मानते हैं। अत: वे मुझे एक प्रगाढ़ मित्र के रूप में लेते हैं। लाजिमी है। जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, जैसे एक कवि दूसरे की प्रशंसा नहीं सुन सकता, ठीक वैसे ही दो ज्ञानीजन मित्र नहीं हो सकते। खैर, होली है। होली पे ज्ञान की बातें नहीं होनी चाहिए।
 
ज्ञानी जी को होली की घनघोर रूप से प्रतीक्षा रहती है। जैसे-जैसे होली का दिन पास आता है, उनका चेहरा खिलता जाता है। होली पे वे मोहल्ले की औरतों संग दिल मिलाने को बेताब हो उठते हैं। उनमें एक अजीब किस्म का नटखटपन आ जाता है। बच्चों की बात और है। परंतु जब बड़ा नटखट हो जाए तो इसके निहितार्थ कुछ अलग होते हैं। होली के आस-पास घटने वाली कई घटनाओं से ज्ञानी जी प्रसन्न होते हैं। एक-उनकी अपनी पत्नी, जी हां निजी पत्नी हर होली में मायके की हो जाती हैं। पत्नी का मायके जाना। पति को मौके पे मौके मिल जाना। ज्ञानी जी भी अपने दिल के मैदान मे चौके पे चौके जड़ते हैं।
 
खुले सांड सा महसूस करते हैं। दूसरी घटना-ज्ञानी जी स्वयं को अत्यंत ज्ञानी मानते हैं। ज्ञानियों की आदत तो आपको पता ही है। बुरा मानना इनका प्रिय शगल होता है। एक उत्सव की तरह लेते हैं, ये बुरा मान जाने को। अपने धर्म से कभी पीछे नहीं हटते। तमाम उत्सवों में वे ‘बुरा-मानों-धर्म’ अवश्य धारण करते हैं। वरना भीड़ को ज्ञात नहीं होता कि आदमी ज्ञानी किस्म का है। ले देकर उसके पास ज्ञान की चादर ही है, जिससे वह अपनी नंगई ढंकता है। तो ज्ञानी जी का भी परम ज्ञान यही है कि ‘कुछ मानो या न मानो, बुरा जरूर मानो।’ इससे व्यक्तित्व में मनहूसियत के साथ गंभीरता बढ़ती है। 
 
वजन बढ़ता है। आदमी आपके बारे में ‘डिगिनिफाइड’ जैसा वजनी शब्द गढ़ता है। अपनी आंखों के फ्रेम मे आपकी बुद्धिमान छवि मढ़ता है। ज्ञानी जी साल भर बैठकर अनुमान लगाते हैं। चिंतन करते हैं कि किससे, कैसे, कब और कितना बुरा मानना है।
 
तीसरी घटना यही कि ज्ञानी जी को एक कार्य बड़ा प्रिय है। होली कीचड़ से खेलना। मतलब कीचड़ उछालना। ये कार्य वे बड़ी तल्लीनता के साथ करते हैं। उनके अनुसार होली इसीलिए मनाते हैं। कई बार तो वे कीचड़ के साथ और भी बहुत कुछ उछालते हैं। अपना नकाब उतारते हैं। दिल खोलकर गरियाते हैं। होली वाले दिन वे तुलसीदास के चेले हो जाते हैं। कहते हैं, ‘तुलसी या संसार मे, पाखंडी को मान। सीधों को सीधा नहीं, झूठों को पकवान।’ और अपना पाखंड उतारते हुए कहते हैं ‘बुरा न मानो होली है।’ 
 
चौथी घटना भी पत्नी के मायके जाने से है। दूसरे की पत्नियों के दिल मे समाने से है। पूर्वज्ञात है कि वे खुले सांड सा महसूस करते हैं। मन में लड्डू फूटते हैं। होली में तो एकसाथ कई लड्डू फूटते हैं। और न सिर्फ मन, बल्कि शरीर के अंग-अंग में बहुत कुछ फूटने लगता है। होली में ही वे ‘रंग-रैलियां’ मनाते हैं। कृपया रैलियां ही पढ़ें। रलियां नहीं। देवर का भयंकर रूप उनपे हावी रहता है। मान-मर्यादा जैसे अमूर्त संज्ञाओं का वे जरा सा भी असर नहीं लेते हैं। 
 
अपनी कुलबुलाती जवानी को बाहर आने का पुरजोर मौका देते हैं। उनके अरमान दूध हैं। होली दुधारू गाय है। इस चक्कर मे लाते पड़ जाएं, कोई गम नहीं। क्योंकि वे मानते हैं हम किसी से कम नहीं। हर होली में ज्ञानी जी जैसे कइयों के दिल के गुल मे आब होती है। शरारत के नकाब में छुपी अंदर की नंगई बाहर आने को बेताब होती है। सुबह से लेकर शाम तक, शराब से कई बार आदाब होती है। आंखों के नशे में शबाब होती है।
 
किंतु इस बार ज्ञानी जी के रंग मे भंग पड़ गया है। पत्नी का मायके जाने का बिल पारित होने से पहले ही रद्द हो गया है। हुआ यह कि पत्नी अपने भाई की पत्नी से बहस कर ली हैं। जैसा कि अमूमन होता है। बुरा मान गर्इं। ज्ञानी जी ने बहुत समझाया। मगर पत्नी ने अपना पत्नी धर्म निभाया। वे नहीं मानी। पति की बात इतनी जल्दी पत्नी मान जाए तो पत्नी पे लानत। कुल मिलाकर इस होली पे पत्नी पास हैं। ज्ञानी जी भयानक रूप से उदास हैं।
 
उनके चेहरे की आभा खो सी गई है। मन के तालाब की सारी मछलियां पानी में मर गई हैं। बहुत अरमान संजोए थे। इस बार न सिर्फ अपने मोहल्ले, बल्कि दूसरे मोहल्ले की भाभियों को छेड़ने वाला साहसिक प्लान बनाया था। एकदम दूसरे देश की सीमा पे सर्जिकल स्ट्राइक जैसा प्लान। लुंगी डांस दिखाने का प्रोग्राम था। 
 
अपने ही वस्त्रों का हरण करने/करवाने के ख्वाब थे। घर को मदिरालय और भंग भंडार में परिवर्तित करने का स्वप्न चूर-चूर हो गया। सारे अरमान तीन-तेरह हो गए। बहुत बुरी तरह बुरा मान गए। कभी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। ‘तन दे, मन दे’ का कार्यक्रम ऐसी-तैसी में चला गया। कबीरदास झूठ ही कह गए थे। माया, मन, आशा और तृष्णा सब तो मर गए। बस शरीर  जिंदा रह गया। अरमानों का कत्ल अपनों के हाथों पहले होता है। दाग लगाए लंगोटिया यार।
 
पत्नी को पति की उदासी महसूस हुई। सोचने लगी बहुत प्यार करते हैं अपने ससुरालियों को। जरा सी अनबन से दुखी हो गए। बोली, ‘अजी उदास न हो। थोड़े दिन में अनबन दूर हो जाएगी। फिर दोनों साथ चलेंगे मेरे मायके। आप बुरा न मानिए। इट्स होली डे। जस्ट चिल।’ 
 
ज्ञानी जी के हलक में एक वाक्य लटका रह गया किंतु तब होली तो ‘हो ली’ होगी न जान की दुश्मन जीवनसंगिनी। पत्नी के समक्ष हकीकत बयान नहीं होती। न आंखों से, न जुबान से। मेरी ओर से ज्ञानी जी को सपत्नीक होली मुबारक!
 
 
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