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यायावरों के साथ: ऊफरैंखाळ, शशिखाळ, मौलेखाळ, चित्तौंड़खाळ, लखोरा घाटी

Jagmohan Singh Jayadha Jigyasu | UPDATED Jun 1 2016 12:56PM IST
नई दिल्ली. भुला सुरेन्द्र सिंह रावत, श्री गोबिन्द भारद्वाज और मैं बीस मई-2016 की रात को दिल्ली से ठीक बारह बजे अपनी गाड़ी से ऊफरैंखाळ भ्रमण की तरफ निकले। भारद्वाज जी गाड़ी चला रहे थे सुरु रावत और मैं सफर का आनंद ले रहे थे। लगभग एक बजे हम गढ़गंगा पहुंचे तो वहां बुद्व पूर्णिमा पर स्नान पर्व होने के कारण भारी भीड़ थी और लंबा जाम लगा हुआ था।
 
 
लगभग तीन घंटे हम जाम में फंसे रहे। कुछ समय बाद जब जाम खुला तो हमारी गाड़ी हवा से बात करते हुए रामनगर की ओर चल दी। एक जगह भारद्वाज जी को नींद आने लगी तो गाड़ी रोक कर उन्होंने आधा घंटा नींद ली। फिर सफर शुरु हुआ और हम लगभग नौ बजे सुबह 21 मई को रामनगर पहुंच गए।
 
 
रामनगर में हमनें कुछ समय विश्राम किया। वहां से श्रीमती कौशल पाण्डेय, लोक गायिका हमारे साथ गई। रामनगर से हमने गर्जिया माता की तरफ प्रस्थान किया। भारद्वाज जी ने गाना प्ले किया। गीत श्री जनार्दन नौटियाळ जी ने गाया था। गीत के बोल सुनकर मुझे अति आनंद का अहसास हुआ।
 
ऊंचि निसि डांड्यौं मा,
गैरि गैरि घाट्यौं मा,
ऐगे बसंत हपार.......श्री जनार्दन नौटियाळ जी द्वारा गया
 
 
कुछ समय बाद हम गर्जिया पहुंचे, वहां पर श्रद्वालुओं की बहुत भीड़ थी। हमने एक जगह आपनी गाड़ी पार्क की। पार्किंग वाला पचास रुपये मांग रहा था। सुरु भुला ने कहा, हम पहाड़ के लोग हैं और तू हमें पहाड़ पर ही लूट रहा है। मुझे भी दुख का अहसास हुआ। अभी तो शुरुवात है, एक दिन हमें अपने पहाड़ पर पराया होने का अहसास भी होगा। बाहरी लोग वहां पर दिन दिन कब्जा करते जा रहे है और हमारा पहाड़ हमारे लिए पराया होता जा रहा है। हमने नदी में स्नान का अानंद लिया। माता के दर्शन कर पाना मुमकिन नहीं हुआ, वहां पर अथाह भीड़ होने के कारण दर्शन कर पाना संभव नहीं था। कुछ देर बाद हमने मर्चुला की तरफ प्रस्थान किया।
 
 
जंगल का क्षेत्र शुरु हो चुका था। चेतावानी लिखी थी जंगली जानवरों से सतर्क रहें। रमणीक ईलाका मनोहारी लग रहा था। कुमाऊं क्षेत्र भ्रमण की मेरे मन में जिज्ञासा थी। एक नदी पर पुल पार करने के बाद मर्चुला बाजार आया, वहां पर रुक कर हमनें भोजन किया। पहाड़ी रास्ता शुरु हो चुका था और हमारी गाड़ी तरंग में पहाड़ चढ़ने को आतुर थी।
 
शशिखाळ, मौलेखाळ रमणीक जगह थी। वहां विकास की झलक दिख रही थी। विकास की झलक दिखनी ही थी, क्योंकि मुख्यमंत्री जी के सलाहकार श्री रंजीत सिंह रावत जी उस क्षेत्र से हैं। सड़क धार ही धार सराईंखेत की तरफ जा रही थी। कसपटिया में गाड़ी रोक कर हमनें एक पहाड़ की चाय की दुकान पर चाय का आनंद लिया। चूल्हें पर कितलि चढ़ी थी। हमनें वहां पर तस्वीरें ली और मुझे कितलि पर अपनी कविता याद आ रही थी।
 
 
हे कितलि,
ऊंचि धार मा,
बेशर्म बणि बैठिं छैं,
दुकानदार का चुल्ला ऐंच,
पिलौणि छैं अपणु,
यौवन रुपी रस.........कवि जिज्ञासू की कल्पना
 
कुछ समय रुकने के बाद हमनें सराईंखेत की तरफ प्रस्थान किया। चित्तौंड़खाळ, लखोरा घाटी मनमोहक लग रही थी। चित्तौंड़खाळ के बाद एक जगह रुक कर श्री भारद्वाज जी ने एक नींद की झपकी ली। हम बेबस थे क्योंकि हमें गाड़ी चलाना नहीं आता। सुरु भुला को मैंने कहा भुला तू जरुर गाड़ी सीख ले। भविष्य में सफर की साथी को कौन चलाएगा। आधा घंटा रुकने के बाद हमने आगे के लिए प्रस्थान किया। एक दिन पहले सराईंखेत से तीन किलोमीटर पहले सुरु भुला के जेठू जी की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। वहां पर हमनें गाड़ी रोकी और सुरु भुला ने नीचे जाकर गाड़ी का निरीक्षण किया। गाड़ी पूर्ण रुप से क्षतिग्रस्त हो रखी थी। सौभाग्य सभी लाेग बच गए। उस स्थान पर ये पांचवीं घटना थी। न जाने वहां पर ऐसा क्या प्रभाव है जो गाड़ी दुर्घटना ग्रस्त हो जाती हैं।
 
 
आगे प्रस्थान करने के बाद हमें दूर से सराईंखेत का क्षेत्र दिखा। सांय के लगभग चार बज रहे थे। सराईंखेत पर एक रोडवेज की गाड़ी खड़ी थी। लंबे चौड़े खेतों के बीच एक गाड बह रही थी। सुरु भुला का पैत्रिक मकान बाजार से ऊपर था। कुछ समय रुकने के बाद हमनें ऊफरैंखाळ के लिए प्रस्थान किया। सड़क कच्ची थी और बांज के जंगल के बीच से गुजर रही थी। ऊंचे स्थान से सफर करना पहाड़ में बहुत अच्छा लगता है, अहसास भी हो रहा था। कुमाऊं गढ़वाळ की सीमा का क्षेत्र जो ठहरा। ऊफरैंखाळ पहुंचने पर कुछ सज्जनों ने हमारा स्वागत किया । श्री जनार्दन नौटियाळ जी से मेरी पहली मुलकात हुई। बाद में हम मुख्य बाजार से आगे चल दिए। क्षेत्र के प्रसिद्व पर्यावरणविद श्री सच्चिदानन्द भारती जी का घर पास ही था। वहां पर हमने रुककर चाय पी और जंगल से काफळ लाती हुई कुछ महिलाओं के दिए काफलों का रस्वादन किया। सुरु रावत जी के जेठू जी मकान बंद था। सुरु भुला ने ताला तोड़कर हमारी रात्रि विश्राम की व्यवस्था की।
 
कुछ समय बाद बादल गिड़गिड़ाने लगे। हवा बहुत तेज से चल रही थी। तेज बरखा हो शुरु हुई और हमें ठंड लगने लगि। दर्द भरी दिल्ली के गर्म मौसम से दूर हमारे तन बदन को सकून मिल रहा था। सफर की थकी हमारी गाड़ी पहाड़ पर बरखा में स्नान करने लगी। बरखा रुकने के बाद हम मुख्य बजार में गए और वहां हमने रात्रि भोजन किया और वापिस लौटकर थके हारे हम बेसुद्ध सो गए।
 
 
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जी के गांव मासौं का भ्रमण
22 मई, 2016 सुबह जब हम उठे तो मौसम बहुत सुहावना था। ऊफरैंखाळ में मंद मंद हवा बह रही थी। सुरु भुला ने कहा चलाे गढवाली जी के गांव मासौं का भ्रमण करके आते हैं। उस दिन ऊफरैंखाळ इंटर कालेज का स्वर्ण जयंती समारोह भी था। हमें कार्यक्रम में शामिल होने के लिए एक बजे तक लौटना था। हम जल्दी तैयार हुए और भरणौ होते हुए एक घंटे में जगतपुरी पहुंचे। वहां पर मासौं गांव की एक माता जी से मुलकात हुई। माता जी ने पूछा मुझे मासौं जाना है। हमने कहा माता जी चलो हमारे साथ। माता जी कहने लगी मेरे बुढ्या सामने चक्की पर गए हैं, उन्हें भी साथ लेना है। थोड़ी देर में बोडा जी आए और गाड़ी में बैठ गए। बोडि जी कड़वे तेल के पीपे का विशेष ध्यान रख रही थी। मैंने कहा बाेडि चिंता मत करो, तेल गिरेगा नहीं। हमनें बोडा बोडि जी से संवाद किया। बोडि जी ने अपना नाम पार्वती और बोडा जी ने पदम सिह बताया। बता रहे थे जब हमारी शादी हुई तो बोडा जी की उम्र ग्यारह साल और मेरी उम्र नौ साल थी। हमारे पांच लड़के आैर पांच लड़कियां हैं। तेरह हमारे नाती पाते हैं।
 
 
जिज्ञासा वश हमनें उनसे वीर चन्द्र सिंह गढवाळि जी के बारे में पूछा। उन्होंने बताया बेटा उनके पुरातन मकान का नामो निशान नहीं है। उनके लड़के कोटद्वार बस गए है। उन्होंने बताया गढवाली जी लंबे चौडें थे और रंग में सांवले। इससे ज्यादा जानकारी उनसे प्राप्त नहीं हुई। बोडा बोडी मासौं बाजार आने पर ऊतर गए। हमने बाजार से चन्द्र सिंह गढ़वाली जी का गांव देखा। पुरातन मकान की जगह एक सगोड़ी सी नजर आ रही थी। हमें ताज्जुब हुआ, ऐसे महान व्यक्ति के पुरातन घर के अवशेष तक मौजूद नहीं हैं। वहां पर स्मृति के रुप में कुछ तो होना ही चाहिए था। गढवाली जी के सुपुत्र श्री आनंद सिंह और कुशाल सिंह भी स्वर्गवासी हो चुके हैं। पहाड़ के गांधी स्व. इन्द्रमणि बडोनी जी के गांव जैसा हाल भी यहां का था। नाम बड़ा पर विकास की झलक नहीं।
 
मासौं बजार में रुकने के बाद हम पीठसैण के लिए चल दिए। सड़क उबड़ खाबड़ थी। दूर कहीं ऊंची जगह पर एक हस्पताल बना हुआ था। लगता नहीं यहां कोई ईलाज की व्यवस्था होगी। चढ़ाई का मार्ग था गाड़ी किसी प्रकार हमारे प्रिय भारद्वाज जी चला रहे थे। कुछ समय चलने के बाद हम मैखुरी नामक जगह पर रुके। एक सज्जन वहां पर हमें मिले। हमनें जंगल की ओर निहारा जो मनमोहक लग रहे थे। कुछ तस्वीरें लेने के बाद हमनें पीठसैण के लिए प्रस्थान किया। आस पास को क्षेत्र सौंदर्य पूर्ण था। कुछ पुरातन मकान बंजर से दिख रहे थे जिन्हें खर्क कहते हैं। वर्तमान में वहां गोरु बाखरौं की झलक नजर नहीं आ रही थी। एक जगह हाट मिक्स प्लांट चल रहा था। सारे लोग परदेशी से लग रहे थे। बेचारे हमारे उत्तराखंड की सड़कों के निर्माण में व्यस्त। पीठसैंण पहुंचने पर एक विशाल मैदान नजर आया। वहां पर कृषि विभाग के एक अधिकारी की जीप नजर आई, जो बिंसर भ्रमण पर गए थे।
 
 
जिंदगी में पहला मौका था जब गढ़वाली जी की मूर्ति देखने का मौका मिला। उनकी जीवनी मैं पढ़ चुका था। जीवन के अंतिम दिन उनके ऐसे ही बीते। खास मान सम्मान उनको नहीं दिया गया। वर्तमान में उनके नाम पर योजनाएं भी चल रहीं हैं। मूर्ति के पास जाकर हमनें उनको नमन किया। पेशावर कांड के उनके साठ साथियों के नाम वहां पर अंकित हैा।
 
हमें कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जल्दि लौटना था। उतराई का सड़क मार्ग था। थोड़ी देर बाद हम मासौं बाजार पंहुचे तो रुकने पर एक सज्जन ने बताया आपकी गाड़ी पेंचर हो गई है। जल्दी से हमनें गाड़ी का टायर बदला और ऊफरैंखाळ के लिए प्रस्थान किया। लगभग बारह बजें हम ऊफरैंखाळ पहुंच गए।
 
कालेज का स्वर्ण जयंती समारोह शुरु हो चुका था। अपार जन समूह दिख रहा था। ऊंचा स्थान होने की वजह से हवा खूब चल रही थी। स्कूल के वर्तमान और पुराने छात्र मौजूद थे। सेवानिवृत्त अध्यापकों को कार्यक्रम में बुलाया गया था और उनका मान सम्मान किया जा रहा था। सरस्वती वंदना शुरु हुई अौर सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु हुए। श्री जनार्दन नौटियाल जी ने "ऊंचि नीसि डांड्यौं मा" गीत गाकर दर्शकों का मन मोह लिया। गजेंद्र सिंह राणा जी ने अपने चिरपरिचत अंदाज में गीत गाए। मुझे भी कविता पाठ का मौका मिला, मैंने अपनी कविता बुढ़ड़ि और तीन पराणि का काव्य पाठ किया। सांय के सात बज चुके थे कार्यक्रम समाप्ति की ओर था। उसके बाद हम एक सज्ज्न के घर गए जिनका ना श्री मोहन सिह रावत था। उनके घर पर भोजन करने के उपरांत हम अपने कमरे में चले गए।
 
ऊफरैंखाळ में कश्मीरी लाला के नाम की चर्चा हो रही थी। मैंने सोचा कश्मीर को होगा। मेरा यात्रा वृतांत पढ़कर श्री रवीन्द्र रावत जी ने जानकारी दी वो बहुत समय तक कश्मीर में रहा इसलिए उनको कश्मीरी लाला कहते हैं। ऊफरैंखाळ में पवन उर्जा सयंत्र लगा है पर काम नहीं करता। उसकी पंखुड़ियां गायब हैं। दुबारा उसे चालू करने का प्रयास नहीं किया गया। पास ही मैंने देखा गधेरे में पानी की तल्लैया बनाई गयी हैं, जिनमें वर्षा जल संग्रहित था। श्री सच्चिदानंद भारती जी के प्रयास से इन्हें बनाया गया होगा। पास के जंगलों में आग से जले बांज के वृक्षों को देखकर बहुत ही दुख हो रहा था। मन में सवाल उठ रहे थे ऐसा क्यों करते हैं लोग। ऊफरैंखाळ से कुमाऊं और गढ़वाळ की खूबसूरत पहाड़ियां नजर आती हैं।
 
सुरु भुला को दिल्ली अपने जेठू जी को देखने लौटना था। जबकि हमारा कार्यक्रम गरुड़ तक अपने पड़ोसी श्री प्रताप सिंह नेगी, फलांटी गांव की पुत्री के शादी समारोह में शामिल होने का था। मन मसोस कर मुझे भी लौटना पड़ा। 23 मई.2016 सुबह आठ बजे हमने बैजरौं की तरफ प्रस्थान किया। मेळधार में रुककर हमनें कुछ तस्वीरें ली। नीचे की तरफ भगवती तलैया मंदिर दिख रहा था। घाटी बहुत ही रोमाचंकारी लग रही थी। कुछ समय रुकने के बाद हम चौखाळ होते हुए कनेरा जहां पर श्री उपेन्द्र पोखरियाळ जी का प्रयास संगठन के माध्यम से बनाया सामुदायिक भवन है वहां पहुंचे। उससे आगे हम स्यूंसी बजार गए और वहां पर चाय पी। कुछ देर रुकने के बाद बैजरौं आकर हमने भोजन किया। श्री जनार्दन नौटियाळ जी को बीरोंखाळ अपने गांव जाना था। श्री नौटियाळ जी वहां से अपने गांव के लिए बस में बैठ गए। भोजन करने के बाद हम सतपुलि की तरफ चल दिए। जाने का विचार तो हमारा नैनी डांडा होते हुए दुगडडा जाने का था पर श्री भारद्वाज जी को सतपुलि के पास मलेठी गांव जाना था।
 
मार्ग में हमें फरसाड़ी, खळधार, वेदीखाळ, घण्याखाळ बाजार दिखाई दिए। पोखड़ा से पहले हमनें रुककर पोखड़ा की कुछ तस्वीरें ली और आगे चल दिए। जिनौरा गांव के पास गुजरते हुए सुरु रावत ने बताया वो बिमल कंडारी जी का घर है। हमनें उनके घर की तस्वीरें ली और स्वर्गवासी कंडारी जी को यादि किया जो एक साहित्यकार थे। कुछ समय बाद हम रीठाखाळ पहुंचे। रीठाखाळ के बाद सुरु रावते ने एक पहाड़ी ओर इशारा किया । बताया ये पहाड़ गणेश जी जैसा दिखता है। कोई इसे शिवलिंग भी बताते हैं। वहां पर नयार नदी का मोड़ हैं और पहाड़ की धार नदी को छूती है। जो दिखने में हाथी की सूंड की तरह लगती है। तस्वीरें लेने के बाद हमने आगे प्रस्थान किया। कुछ समय चलने के बाद सतपुलि से पहले हम मलेठी गांव में रुके और वहां पर भोजन किया। हल्की बरसात की बूंदे गिर रही थी। पूर्वी और पश्चिम नयार की घाटी और बांघाट का क्षेत्र नजर आ रहा था। मौसम भी सुहावना हो गया था।
 
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