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बच्चों को डांटकर नहीं प्यार से पढ़ाएं और सिखाएं

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Sep 2 2017 12:10PM IST
बच्चों को डांटकर नहीं प्यार से पढ़ाएं और सिखाएं

कहते हैं कि बच्चों का दिमाग कच्ची मिट्टी की तरह होता है। उसे जिस रूप में ढालो, उसी आकार में आ जाता है।

ऐसे में जब बात पढ़ाई की हो तो उनके नाजुक दिल और दिमाग को सही दिशा देना और भी जरूरी हो जाता है। लेकिन कुछ पेरेंट्स कॉम्पिटिशन की रेस में अपने बच्चे को आगे ले जाने के चक्कर में बच्चे पर जरूरत से ज्यादा प्रेशर देने लगते हैं।

कभी 'अच्छे स्कूल' में एडमिशन की उम्मीद का बोझ तो कभी सभी सब्जेक्ट्स में ए ग्रेड लाने का।

इन्हीं उम्मीदों पर जब बच्चा खरा नहीं उतरता तो कई बार पेरेंट्स अपना धीरज खो देते हैं और बच्चों को डांटना और पीटना शुरू कर देते हैं।

क्षमता से ज्यादा उम्मीद करना गलत

चाइल्ड साइकायट्रिस्ट कहते हैं, अब पेरेंट्स की बच्चों से उम्मीदें बहुत बढ़ गई हैं। सोसायटी में कॉम्पिटिशन की वजह से वह बच्चों पर प्रेशर डालते हैं।

जब बच्चा उनके हिसाब से परफॉर्म नहीं कर पाता तो वह उसे डांटते हैं या पिटते हैं। यह आचरण पूरी तरह से गलत है। पेरेंट्स को समझना होगा कि 3-4 साल की उम्र में बच्चे का दिमाग इतना विकसित नहीं होता कि वह दो अक्षरों के बीच का फर्क पूरी तरह से कर पाए।

इस उम्र में वह साउंड और विजुअल के माध्यम से चीजें समझते हैं। यही वजह है कि प्ले स्कूल में बच्चों को गिनती और कविताएं, ओरली याद करवाई जाती हैं।

अक्षरों की बनावट को याद रखना और उन्हें लिखना 5 साल की उम्र के बाद सिखाया जाता है। ऐसे में अगर कम उम्र में पेरेंट्स बच्चे को डराकर पढ़ाने की कोशिश करते हैं तो बच्चे में निगेटिव बिहेवियर डेवलप होने लगता है।

वह चिड़चिड़ा होने के साथ ही गुस्सैल और दिमागी रूप से कमजोर हो जाता है। आगे चलकर बच्चा पढ़ाई से जी चुराने लगता है। पेरेंट्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को प्यार और सहज भाव से पढ़ाएं और सिखाएं। उन पर गुस्सा करने से फायदा की जगह नुकसान होगा।

सभी पेरेंट्स अपने बच्चे का एडमिशन टॉप स्कूल में कराना चाहते हैं। ऐसे में बच्चों पर इंटरव्यू को लेकर पढ़ाई का प्रेशर बनाते हैं। हर बच्चे की सीखने की क्षमता अलग-अलग होती है।

बच्चे बेहद नटखट और मूडी होते हैं। कभी वह पढ़ना चाहते हैं तो कभी खेलने की धुन में रहते हैं। ऐसी स्थिति में जब बच्चा पढ़ना नहीं चाहता तो उस पर दबाव नहीं बना सकते।

अगर स्कूल का डर बच्चे के मन में बैठ गया तो वह पढ़ाई से दूर होने लगेगा। बच्चों को उनकी भलाई के लिए डांटना सही है लेकिन यह इतना ज्यादा नहीं होना चाहिए कि उनके मन में डर पैदा हो जाए।

बार-बार डांटने और पिटाई करने से बच्चे और बिगड़ने लगते हैं। ऐसे में बच्चों को बच्चा बनकर ही पढ़ाएं या खेल-खेल में पढ़ाने की कोशिश करें। बच्चों के साथ जबरदस्ती न करें।

प्यार और डांट के बीच बैलंस जरूरी

बच्चों को सुधारने के लिए उन्हें डांटना जरूरी है, लेकिन यह डांट ऐसी नहीं होनी चाहिए कि भविष्य में बच्चा आपसे बात करने में डरने लगे या फिर आपसे कटा-कटा रहने लगे।

डांट और प्यार के बीच एक बैलंस होना चाहिए। पैरंट्स का बच्चों को पढ़ाते समय धीरज रखना जरूरी है। आज कल पेरेंट्स में अपने बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा कॉम्पिटिशन की भावना आ गई है। वह अपने बेटे-बेटी पर अच्छा परफॉर्म करने को लेकर प्रेशर बनाते हैं।

पेरेंट्स को यह समझना होगा कि बच्चे दिमागी तौर पर इतना प्रेशर झेलने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उन्हें प्यार से समझाने की जरूरत है। ध्यान रखें कि पढ़ाई उनके लिए मजेदार हो न कि मन में डर पैदा करने वाली। डर पैदा होने से बच्चे पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है।

पेरेंटिंग में डर की कोई जगह नहीं

पेरेंटिंग में सबसे ज्यादा प्यार की जरूरत होती है। बच्चे स्वभाव से नटखट होते हैं। ऐसे में जरूरी नहीं कि जितना एकाग्र होकर आप काम कर रहे हैं वह भी उसी एकाग्रता के साथ पढ़ाई करें। कम उम्र में उनसे बड़ों जैसी एकाग्रता की उम्मीद करना गलत है।

कम उम्र से ही अगर बच्चे को पेरेंट्स डराना या धमकाना शुरू कर देंगे तो उसका बड़ों के साथ कम्यूनिकेशन गैप हो जाता है। उसके अंदर डर बैठ जाता है। आगे चलकर वह हर छोटी-बड़ी बात छिपाने लगता है। बच्चों को प्यार और दुलार से पढ़ाएं। किसी भी कीमत पर अपना संयम न खोएं।

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-Tags:#Way To Teach Children#Parents Love
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