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कार्यकर्ताओं के दमखम की परीक्षा बन गया है ''बवाना उपचुनाव''

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Aug 23 2017 1:15AM IST
कार्यकर्ताओं के दमखम की परीक्षा बन गया है ''बवाना उपचुनाव''

बवाना विधानसभा उपचुनाव उम्मीदवारों की खूबियों-खामियों और चुनाव प्रचार में पसीना बहा चुके दिग्गज नेताओं की वाक प्रवीणता के बाद अब सही मायने में राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं की परीक्षा बन गया है। ये परीक्षा बुधवार 23 अगस्त को मतदान के दिन होगी और इसमें जिस पार्टी के कार्यकर्ता अपने विरोधियों से ज्यादा भागदौड़ करेंगे वो ही बाजी मार ले जायेंगे। 

बवाना के गांवों, कॉलोनियों और जेजे क्लस्टर में घूमने के बाद ये साफ दिख जाता है कि मुकाबला सिर्फ आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच है। लेकिन कांग्रेस की अनदेखी बड़ी भूल साबित हो सकती है। ठीक है, कांग्रेस जीतने की हालत में दूर-दूर तक नहीं पर आगे चल रही दोनों पार्टियों में से किसी एक का खेल बिगाड़ने की स्थिति में जरूर है। 

अगर कांग्रेस ने उम्मीद से ज्यादा तादाद में वोट हासिल किये तो केजरीवाल की पार्टी के लिये हार से बचना मुश्किल हो जायेगा। भाजपा के नेता इसी वजह से चाहते हैं कि जेजे क्लस्टर और अनधिकृत कॉलोनियों में आम आदमी पार्टी के वोटबैंक में बड़ी सेंध लगाने में कांग्रेस सफल हो जाये। दूसरी तरफ कांग्रेस अगर बेहतर नहीं कर पायी तो आप को जीत पाने से रोकना भाजपा के लिए मुश्किल हो जायेगा। उपचुनाव से जुड़े अहम मुद्दों पर आनंद राणा की स्पेशल रिपोर्ट।

कार्यकर्ताओं का आंकलन

अगर कार्यकर्ताओं की बात करेंगे तो आप, भाजपा और कांग्रेस को 22 अगस्त को अपनी रणनीति बहुत ही बेहतरीन ढंग से तैयार करनी होगी। जो भी पार्टी मुगालते में रहेगी उसकी नाव डूब सकती है। अब वे दिन बीत चुके हैं जब ज्यादातर कार्यकर्ता अपनी पार्टी के लिये जी-जान से जुटे रहते थे। दिल से काम करने वाले अब बहुत कम रहे गये हैं। हालत ये है कि खुद के नंबर बनाने वाले और मक्खनबाजी में माहिर लोग बड़े नेताओं के सामने ऐसा आभामंडल खड़ा कर लेते हैं कि जुझारू कार्यकर्ता खुद को कोने में खड़ा पाते हैं। 

नतीजा ये होता है कि मतदान के दिन पोलिंग स्टेशन के आसपास किसी खोमचे के आगे स्वयंभू बडबोले कार्यकर्ता बड़ी-बड़ी फंकेंने में लगे रहते हैं और कर्मठ कार्यकर्ता प्रचार के दौरान हुई अपनी अनदेखी से दुखी होकर वोट डलवाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते। नतीजा हार के तौर पर सामने आता है। आप और भाजपा दोनों के सामने अपने कार्यकर्ताओं को लेकर एक जैसी स्थिति बनी हुई है।

आम आदमी पार्टी 

आम आदमी पार्टी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत प्राप्त की थी तो अरविंद केजरीवाल ने कार्यकर्ता की मेहनत को श्रेय दिया था। लेकिन इसके बाद अब अगस्त 2017 में कार्यकर्ताओं की एकजुटता दरक चुकी है। नगर निगम चुनाव और राजौरी गार्डन उपचुनाव में आप को जो बुरी हार झेलनी पड़ी उसकी जड़ में कार्यकर्ताओं का मोहभंग होना एक बड़ी वजह थी और अब बवाना में भी कुछ-कुछ वैसे ही हालात हैं। 

बवाना के पांच वार्डों में नगर निगम चुनाव के दौरान का आम आदमी पार्टी का तीसरे स्थान पर खिसकना सिर्फ और सिर्फ कर्मठ कार्यकताओं की अनदेखी का खामियाजा था। इस कड़वी सच्चाई को केजरीवाल और उनकी पार्टी के रणनीतिकारों को न चाहते हुए भी गले से नीचे उतार लेना चाहिए। आम आदमी पार्टी भी अब उन ज्यादातर रोगों से ग्रस्त हो चुकी है जिसके शिकार देश के दूसरे दल हैं। 

नगर निगम चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के बवाना के 6 वार्डों से उम्मीदवारों ने वे सभी हथकंड़े अपनाये थे जो चुनाव में 'आवश्यकता' बन चुके हैं। बावजूद इसके तीसरे नंबर पर खिसकना पड़ा तो फिर वजह क्या थी? जवाब सिर्फ एक है- पार्टी कार्यकर्ताओं की उम्मीदवारों के चयन से लेकर पोलिंग स्टेशन तक हर मामले में हुई अनदेखी। 

भाजपा

भाजपा की बात करें तो चुनावी प्रबंधन संभाल रहे उनके नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरे साफ पढ़ी जा सकती हैं। बवाना के चुनाव में बड़ी जनसभा आयोजित करने का मसला रहा हो या फिर किसी गांव या कॉलोनी के नुक्कड़ पर कोई बैठक करने की बात रही हो, इस चुनाव में लोग जुटाने में पसीना बहाना पड़ा है। बवाना सीट के सभी छह वार्डों के कार्यकर्ता रहे हों सा फिर स्थानीय नेता सब के सब वेदप्रकाश को उम्मीदवार बनाये जाने के सख्त खिलाफ थे और उनकी नाराजगी आज भी बनी हुई है। 

जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो दिल्ली भाजपा नेतृत्व को इस बात का अहसास हुआ कि हालात किस कदर हाथ से निकल चुके हैं। कुछ दिन तो कार्यकर्ताओं को मनाने-समझाने में ही बर्बाद हो गये। भाजपा के बवाना से पूर्व विधायक रहे गुगन सिंह और दो बार पार्षद रहे नारायण सिंह सिर्फ वेदप्रकाश को टिकट दिये जाने से नाराज होकर आम आदमी पार्टी में शामिल हो गये और भाजपा नेतृत्व ठगा सा रह गया। कार्यकर्ताओं की नारजगी बहुत गहरे तक फैली हुई है और भाजपा नेतृत्व ऊपरी ईलाज में जुटा है। 

ये बात ठीक है कि बड़े नेताओं की सभा में बवाना के भाजपा नेता मंच पर होते हैं पर उनमें से ज्यादातर के चेहरों पर छाई खामोशी बता रही है कि ये मौजूदगी मजूबरी का सौदा है। जितना भी हो सके 'डैमेज कंट्रोल' के लिये भाजपा के पास 22 अगस्त का दिन है। मतदान के दिन 23 अगस्त को पता चल जायेगा कि भाजपा नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं और बवाना के स्थानीय नेताओं का मन बदलने में कामयाब हुआ या नहीं।

कांग्रेस

कांग्रेस के सामने एक अलग तरह की चुनौती है। साल 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में जमीन संूघ चुकी कांग्रेस के बड़े नेता अपने कार्यकर्ताओं के मन में यह बात नहीं उतार पाये हैं कि वे जीत सकते हैं। इसी वजह से कांग्रेस का कार्यकर्ता बिलकुल भी उत्साहित नजर नहीं आ रहा है। अब चुनाव है तो रस्म अदायगी तो करनी ही है लिहाजा चुनावी सभाएं भी हुई और पदयात्रा भी पर नेता और कार्यकर्ता मन में हार स्वीकारे बैठे हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ता 23 अगस्त को अपनी पार्टी के लिए कितना पसीना बहाते है, ये देखने की बात होगी। सुरेंदर लगातार दो चुनाव हारे है।

आप को करनी होगी कड़ी मशक्कत

बवाना विधानसभा चुनाव में मतदान का वोट प्रतिशत क्या रहेगा? इस सवाल पर पार्टियों से लेकर आम लोगों तक चर्चा गरम है। आम राय है कि ये आंकड़ा 45 से 50 फीसदी के बीच रह सकता है। बवाना विधानसभा में मतदाताओं की कुल तादाद 2 लाख 94 हजार 589 है। 

इनमें से पुरूष मतदाता 1 लाख 64 हजार 114 और महिला मतदाता 1 लाख 30 हजार 143 हैं। 25 मतदाता थर्ड जेंडर के हैं। प्रति मतदान केन्द्र औसत तौर पर 776 मतदाता हैं। अगर 45 फीसदी से 50 फीसदी के बीच मतदान हुआ तो 1 लाख 32 हजार से लेकर 1 लाख 47 हजार के बीच वोट पड़ेंगे। 

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 14846 वोट मिले थे और अबकी बार कहा जा रहा है कि कांग्रेस अपनी स्थिति में सुधार करते हुए कम से कम 15 हजार वोटों का इजाफा कर सकती है, यानि कांग्रेस कुल पड़े वोटों में से 30 हजार वोट प्राप्त कर सकती है। 

ऐसा हुआ तो ये 15 हजार वोट आम आदमी पार्टी की झोली से कांग्रेस के पास आयेंगे। दूसरी तरफ बसपा के कैडर वोट आप की तरफ खिसकने की संभावना है। नगर निगम चुनाव में बवाना वार्ड में बसपा ने 5356 वोट तथा रोहिणी सी वार्ड में 10621 वोट हासिल किये थे।  

आम आदमी पार्टी के सामने समस्या ये है कि लोगों का केजरीवाल की पार्टी से मोहभंग हुआ है जिसका असर उसके वोट शेयर पर पड़ना तय है। 2013 के चुनाव में आप ने बवाना में 42768 वोट लिये थे। और 2015 में 109259 वोट हासिल किये थे, लेकिन वो दौर गुजर चुका है। इस साल हुए नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी को बवाना के 6 वार्डों में कुल मिलाकर 36891 वोट ही मिल पाये थे। 

भाजपा का कैडर वोट पिछले कई चुनावों से रहा है लगभग स्थिर 

अगर आप को उपचुनाव में भाजपा से आगे निकलना है तो उसे करीब 20 हजार वोट और ज्यादा जुटाने होंगे ताकि उसके वोट 55 हजार के आसपास पहुंच सकें।  भाजपा ने 2013 के चुनाव में बवाना सीट पर 68407 वोट हासिल किये थे और 2015 में जब केजरीवाल का तूफान चला तब भी इस सीट पर भाजपा 59236 वोट लेकर गई थी। 

साफ है कि भाजपा का वोट मोटे तौर पर एक समान रहा था। इस साल हुए नगर निगम चुनाव में भाजपा को बवाना के 6 वार्डों में कुल मिलाकर 53830 वोट मिले थे। अगर इस पैटर्न पर भरोसा रखे तो भाजपा को 55 हजार से के आसपास वोट मिलेंगे।  इस बार अगर भाजपा का वोट इसी के आसपास रहा तो भाजपा अपने कैडर वोट के दम पर चुनाव जीत सकती है। 

इस राह में केजरीवाल उसके लिये रोड़ा नहीं हैं बल्कि भाजपा के खुद के उम्मीदवार वेद प्रकाश बाधा बने हुए हैं जिन्हें लेकर भाजपा के कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी है। ये नारजगी बरकरार रहने पर ही आप को जीत मिल पायेगी। अगर भाजपा पूरे दमखम से जुटी तो बाजी पलट भी सकती है।  

आप को अपने दो वार्डों बेगमपुर और रोहिणी सी से तगड़ी बढ़त की उम्मीद है। बवाना वार्ड में भी उसे भाजपा के मुकाबले ज्यादा वोट की पाने की आशा है। जबकि भाजपा को नांगल ठाकरान और पूठ खुर्द वार्ड में तगड़ी बढ़त की उम्मीद है जबकि रोहिणी डी वार्ड में आप के मुकाबले ज्यादा वोट पाने की आशा है।

बवाना में भाजपा हारी तो ये आप की जीत नहीं होगी

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, उपचुनाव में आप की अगुवाई कर रहे गोपाल राय से लेकर तमाम विधायक और आप पदाधिकारी चुनाव प्रचार के दौरान जोरशोर से ये दावा करते रहे हैं कि हम भाजपा को हरा देंगे। सवाल उठता है कि अगर भाजपा बवाना में हारी तो क्या ये आप की जीत होगी? इसका सीधा और एक शब्द का जवाब है 'नहीं'। 

भाजपा अगर हारी तो ये सिर्फ और सिर्फ वेदप्रकाश को टिकट देने का नतीजा होगा। बवाना में क्या होता अगर भाजपा वेदप्रकाश की बजाय पूर्व विधायक चांद राम या गुगन सिंह को टिकट दे देती? आम आदमी पार्टी को अपनी जमानत बचाने के लाले पड़ जाते। ये आम आदमी पार्टी का नकारात्मक विश्लेष्ण करना नहीं है बल्कि एक ऐसा सच है जिस पर केजरीवाल और उनकी पार्टी को संभाल रहे नेताओं को गंभीरता से बैठकर मंथन करना चाहिए। 

साल 2013 के चुनाव में केजरीवाल को देहात में एक भी सीट नहीं मिली थी और 2015 में देहात की सभी सीटों पर सिर्फ  और सिर्फ आप के उम्मीदवार जीते थे। तो क्या आज भी केजरीवाल देहात में उतने ही मजबूत हैं? जवाब...जी, नहीं।  केजरीवाल चाहे पंजाब की वजह से या किसी और वजह से दिल्ली के गांव-देहात से दूर रहे हों, उनको अब बदलना होगा। बवाना एक मौका हो सकता है, उनके लिये अपनी आंखें खोलने का। 

रामचंद्र विजय प्राप्त करे तो उन्हें ये सोचकर चैन लेने की जरूरत नहीं है कि सबकुछ नियंत्रण में है बल्कि ये सोचकर बाहरी दिल्ली के गांवों, कॉलोनियों और जेजे कलस्टर में केजरीवाल और उनके मंत्रियों को अपनी मौजूदगी दर्ज करवानी होगी कि लोगों से साथ खड़ें हैं। अब ये मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके साथियों पर है कि वे ऐसा करने में दिलचस्पी दिखाते हैं या नहीं। क्योंकि 2020 में अगर तय समय पर ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए तो अब ज्यादा वक्त बचा नहीं है। 

क्या चाहता है देहात

गांव देहात के आदमी विकास कार्यों के नहीं होने पर ज्यादा नाराज नहीं होते है बल्कि उनकी नाराजगी इस बात को लेकर ज्यादा होती है कि मुख्यमंत्री या कोई मंत्री उनसे मेल-मुलाकात करने या किसी सुख-दुख में साथ खड़ा होने आया या नहीं। अगर दूरी बनी तो फिर राजनैतिक नुकसान तय मानिये।

मुस्लिम वोट किधर जायेगा?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मिथ तो टूटा है कि मुस्लिम वोट भाजपा को नहीं जाता। लिहाजा कोई ये कहे कि मुस्लिम वोट पक्के तौर पर हमें ही मिलेगा, ये अपना पक्ष थोड़ा बढ़ा चढ़ाकर दिखाना होगा। 

दिल्ली में 2015 के चुनाव में मुस्लिम वोट एकमुश्त आम आदमी पार्टी की तरफ जाने की बात में दम है पर आगे भी ये सिर्फ केजरीवाल के साथ रहेगा ये तय नहीं माना जा सकता है। बवाना सीट पर कांग्रेस अबकी बार मुस्लिम वोटों में सेंध लगा सकती है और भाजपा को भी इसमें थोड़ी ही सही पर हिस्सेदारी मिल सकती है। 

सब ने लगाया है जोर 

आम आदमी पार्टी बवाना में एक-एक मुस्लिम वोट पाने की कवायद में जुटी दिखी है। केजरीवाल के मंत्री इमरान हुसैन शाहबाद डेयरी के अलावा बवाना झुग्गी कॉलोनी में मुस्लिम वोटों के लिये लगातार लो प्रोफाइल तरीके से जुटे रहे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने स्तर पर ये जानकारी भी जुटाई कि बवाना इलाके के गांव में मुस्लिमों के कितने घर हैं। 

इमरान गुपचुप तरीके से उन घरों तक पहुंचे भी। जाहिर है उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देने के लिये मुस्लिम परिवारों से अपील की ही होगी। उधर, मुस्लिम बस्तियों में आप की सक्रियता देखकर ही कांग्रेस ने सलमान खुर्शीद को कुछ दिन पहले शाहबाद डेयरी की जनसभा में बुलाया। बावजूद इसके भाजपा ने भी मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचने के लिये जोर लगाया है। तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा को उम्मीद है कि उसे मुस्लिम महिलाओं की वोट मिलेंगी।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुद्दे पर भाजपा और आप आमने-सामने

दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने सोमवार को आम आदमी पार्टी पर मुस्लिमों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाते हुए दिल्ली चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करवाई। तिवारी ने अपनी शिकायत में कहा कि आप ने मुसलमानों के लिये सामुदायिक सांप्रदायिक पैटर्न पर वोट देने की अपील करने वाला पोस्टर जारी किया है। 

इन पोस्टर व पैमफ्लेट में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एवं मंत्री इमरान हुसैन की तस्वीरों के साथ बवाना विधानसभा क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाकों में व्यापक रूप से प्रसारित किया गया है। तिवारी ने कहा है कि यह पोस्टर अरविंद केजरीवाल की पार्टी द्वारा चुनाव जीतने के लिये धार्मिक भावनाओं को फायदा उठाने के उनके इरादों को साफ करता है। वहीं इन पोस्टर के संबंध में आम आदमी पार्टी की लीगल सेल ने पुलिस आयुक्त को शिकायत भेजी है। पार्टी ने अपने शिकायत में कहा कि आप को बदनाम करने के लिए कोई व्यक्ति ऐसे पैमफ्लेट छपवाकर बाट रहा है।

कहीं गले की हड्डी तो नहीं बन जाएगा 'स्मार्ट गांव' का झुनझुना

बवाना का चुनाव जीतने के लिये जब आम आदमी पार्टी के रणनीतिकारों ने 'स्मार्ट गांव' का नारा उछाला तो शायद उनके दिलो दिमाग पर चुनाव को एकतरफा बना देने का जुनून तारी था। 

दो-चार दिन के लिये लोगों के बीच स्मार्ट गांव का नारा चर्चा का केन्द्र बना भी पर अब लोगों के ऊपर इसका कोई खास असर दिख नहीं रहा है। ये 'स्मार्ट गांव' या 'आदर्श ग्राम' किस तरह सरकारों की गले की हड्डी बन जाते हैं इस पर केजरीवाल और उनके साथियों ने थोड़ा सामूहिक मंथन किया होता तो शायद वे ऐसा करने के सुझाव को नकार देते। 

बवाना में रात-दिन घूम रहे आम आदमी पार्टी के संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चुनाव प्रचार के दौरान तीन-चार बार तो कुतुबगढ़ गांव पहुंचे ही थे। रविवार शाम को जब वे कुतुबगढ़ गांव के सर छोटूराम पार्क में हुई जनसभा में भाजपा के खिलाफ हुंकार भर रहे थे तो 'प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना' के तहत सांसद मीनाक्षी लेखी द्वारा गोद लिया गया ये गांव कितना 

'विकसित' हो चुका है, इस बारे उन्होंने शायद प्रकाश डाला हो। उनको कुतुबगढ़ को आदर्श ग्राम बनाने की योजना शुरू होने के बाद से ही पटरी से उतर जाने का इल्म है या नहीं ये तो पता नहीं पर इतना तय मानिये जब दिल्ली विधानसभा का अगला चुनाव होगा तो ये स्मार्ट गांव योजना केजरीवाल के लिये सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होगी। 

चुनाव में वोट पाने की गरज से कोई भी योजना शुरू करना आसान है पर उसे कामयाब बनाना बेहद मुश्किल। बवाना के गांव केजरीवाल सरकार के पिछले करीब ढाई साल के कार्यकाल के दौरान से इंतजार कर रहे हैं कि कोई तो काम हो। लेकिन हुआ कुछ नहीं। अब आप के विधायक रहे और भाजपा के उम्मीदवार वेदप्रकाश के सिर ठीकरा फोड़ा जा रहा है कि उन्होंने समस्याओं की जानकारी नहीं दी। 

क्या काम करवाना है इस बारे में कभी नहीं बताया। चलो मान लिया, वेदप्रकाश चादर तान के सो गया था तो मुख्यमंत्री और सरकार ने बवाना की अनदेखी क्यों की? उनको पास तो सारी जानकारी होनी चाहिए थी, उनको तो जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिये बवाना पहुंचना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सारी बातों को भूलाकर फिर भी लोग मुख्यमंत्री को सुन रहे हैं। 

लेकिन वे बार-बार गलती सुधारने का काम नहीं करेंगे। कुतुबगढ़ गांव को जब सांसद लेखी ने गोद लिया तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी कि उनके संसदीय क्षेत्र नई दिल्ली में कोई ग्रामीण गांव नहीं था, लिहाजा उन्होंने कुतुबगढ़ को आदर्श ग्राम बनाने का बीड़ा उठाया। गांव के लोगों ने सर छोटूराम पार्क में सांसद लेखी का अड्टिानंदन भी किया। लेकिन तब से लेकर आज तक कोई काम आगे नहीं बढ़ा। 

ऐसा ही अनुभव केजरीवाल सरकार की स्मार्ट गांव योजना का होगा, इस आशंका से इंकार करने का कोई कारण दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है। केजरीवाल के पास बहुत कम समय है और उनको देहात के गांवों को स्मार्ट गांव बनाना है। अगर वे कामयाब नहीं हुए तो बवाना उपचुनाव में किया गया ये वादा 2020 के चुनाव में उनकी राह का रोड़ा बन जायेगा, तय मानिये।

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