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दुष्कर्म पीड़िता ट्रांसजेंडर को हाईकोर्ट ने माना मेल, आरोपी को दी बेल

haribhoomi.com | UPDATED Aug 25 2016 5:01PM IST
राजनांदगांव. लिंग परिवर्तन करा चुके थर्ड जेंडर से दुष्कर्म के एक मामले में हाईकोर्ट द्वारा पीड़िता को पुरुष बताते हुए आरोपी को जमानत दे देने के एक फैसले से निराश छत्तीसगढ़ तृतीय लिंग वेलफेयर बोर्ड पीड़िता को न्याय दिलाने अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। बोर्ड के पदाधिकारियों का कहना है कि अगर ट्रांसजेंड के बाद भी महिला बना पुरुष, पुरुष ही रहता है, तो पुलिस को 376 के बजाय 377 की धारा लगानी थी।
 
बोर्ड की सदस्य विद्या राजपूत व रविना बलिहा ने सोमवार को एक पत्रकारवार्ता लेकर बताया कि रायपुर के एक मॉल में ब्यूटीनिशन का काम करने वाली राखी (परिवर्तित नाम) ने रायपुर के ही एक निजी अस्पताल में लिंग परिवर्तन कराकर पुरुष से महिला बनी थी। राजनांदगांव के शिवम देवांगन से उसकी जब नजदीकियां बढ़ने लगी तो राखी ने शिवम को अपने बारे में सारी जानकारी दे दी। इसके बावजूद शिवम ने उससे शादी करने की बात कह कई बार शारीरिक संबंध बनाए। वह अपने घरवालों से भी राखी को मिलवाया था। लेकिन अचानक शिवम व उसके घरवालों ने शादी से इनकार कर दिया।
 
मारपीट भी की। राखी जब मामले की शिकायत लेकर राजनांदगांव के चिखली थाने पहुंची तो पुलिस ने भगा दिया। कई बार थाने जाने के बाद भी जब शिवम के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की तो वह रायपुर में एसपी बीएन मीणा से मुलाकात कर अपना दर्द बयां की। इस पर एसपी ने तेलीबांधा थाने में शून्य में मामला दर्ज कर चिखली थाने भेज दिया। तब कहीं जाकर शिवम के खिलाफ दुष्कर्म की धारा 376 पंजीबद्ध की गई।
 
विद्या ने कहा कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो वहां माननीय न्यायाधीश ने सुनवाई के बाद राखी को पुरुष बताते हुए शिवम को जमानत देने का फैसला सुनाया। इससे हम निराश हैं। विद्या ने कहा कि इस मामले में पुलिस का रवैया शुरू से असहयोगात्मक रहा। मेडिकल जांच में भी औपचारिकता निभाई गई, जिससे केस कमजोर पड़ गया।
 
राजनांदगांव के एसपी प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि पुलिस ने तत्कालीन परिस्थितियों व मामले को देखते हुए आरोपी पर धारा लगाई थी। अगर इसमें कोई भी बदलाव जैसी स्थिति सामने आती है, तो यह कोर्ट स्वयं करने में सक्षम होती है। इससे आरोपी को लाभ मिले, ऐसी कोई बात सामने नहीं आती। 
 
राजनांदगांव के विधि विशेषज्ञ एचबी गाजी ने कहा कि माननीय न्यायालय ने पूरे दस्तावेजों के अवलोकन के बाद भी बेल दी होगी। इसमें मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट अधिक महत्वपूर्ण है। हालांकि थर्ड जेंडर के संबंध में अभी कई तरह के कानून व निर्देश तैयार हुए हैं। अगर पीड़िता न्यायालय के फैसले से असंतुष्ट है, तो वह आगे अपील कर सकती है। 
 
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