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जानिए कैसे बस्तर के भेज्जी में नक्सलियों का मुकाबला कर रहे हैं सेना के जवान

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भेज्‍जी. जवान हिंद के अडिग रहो डटे, न जब तलक निशान शत्रु का हटे.. माओवाद के छल युद्ध से लडते जूझते जवानों का रहना और जीना भी किसी युद्ध से कमतर नही है, सोने के लिए पथरीली  जमीन है, तो बिजली के लिए केवल जनरेटर जिसका भी सीमित इस्‍तेमाल करना है, क्‍यों कि कई बार डीजल खत्‍म होता है तो रातें और अंधेरी हो जाती हैं, मनोरंजन के नाम पर अपने ही दुख है जिस पर कभी हंस लेते हैं तो कभी मायूसी भी घेरती है। भेज्‍जी जैसे इलाके मुख्‍य मार्ग से महज बीस किलोमीटर दूर है, लेकिन आलम यह है कि, जवानों के लिए अनाज से लेकर किसी सिपाही के घर का खत भी महीने में चुनिंदा बार ही आ पाने वाले चॉपर के भरोसे होता है। आंतरिक सुरक्षा के लिए जुझ रहे जवानों का हाल यह है कि, अगर किसी के घर मौत हो जाए तो उसे छुटटी तो भले तुरंत मिल जाए पर जाने के लिए उसे हफ्तों का इंतजार करना होता है क्‍यों कि जाने के लिए उसे चॉपर का इंतजार करना होगा।
 
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