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वास्तु शास्त्र: इस दिशा में ना हो घर का पूजा मंदिर अन्यथा झेलने पड़ेंगे भरी संकट

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Nov 30 2017 1:26PM IST
वास्तु शास्त्र: इस दिशा में ना हो घर का पूजा मंदिर अन्यथा झेलने पड़ेंगे भरी संकट

पूजा-पाठ के लिए पूजा स्थल का अपना एक खास महत्व है। इष्टदेव की पूजा करने हेतु घर के मंदिर यदि वास्तु की दृष्टि से सही है तो इसका सकारात्मक परिणाम मिलता है। वस्तुशास्त्र में हर एक दिशा किसी ना किसी देवता से संबंधित है।

इसलिए वास्तु के अनुसार घर का मंदिर यदि सही दिशा में है तो घर में सभी कुशल मंगल रहते हैं। वहीं अगर घर का पूजा मंदिर वास्तु के दृष्टिकोण से सही नहीं है तो घर-परिवार की खुशहाली में संकट खड़ा हो जाता है। वास्तु के अनुसार हम आपको बता रहे हैं कि घर का पूजा मंदिर या स्थल किस दिशा में होना सर्वोत्तम है।

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घर में पूजा स्थल या मंदिर की स्थापना हमेशा उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व की दिशा में करनी चाहिए। वास्तु के अनुसार ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) से ईश्वरीय शक्ति का प्रवेश होता है। साथ ही दक्षिण-पश्चिम के कोण से ईश्वरीय शक्ति का निकास होता है। इसलिए इस दिशा में ही घर का मंदिर और पूजा का स्थान होना चाहिए।

यहां न हो मंदिर 

वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में घर का मंदिर और पूजा का स्थल पूर्णतः वर्जित है।

घर का मंदिर या पूजा स्थान रसोईघर में नहीं रहना चाहिए। रसोईघर में मंगल का वास होता है और मंगल ग्रह को उग्र ग्रह माना गया है। इस स्थान पर पूजा मंदिर की स्थापना और पूजा करने वाला कभी खुश नहीं रह पाता है।

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इसके अलावे पूजा घर में गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमा को कभी भी खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। इसके अलावे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पूजा मंदिर या पूजा स्थल अँधेरे में न हो।

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