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लोभी व्यक्ति कभी भी स्वाभिमानी नहीं हो सकता

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Aug 22 2017 11:34AM IST
लोभी व्यक्ति कभी भी स्वाभिमानी नहीं हो सकता

लोभ मनुष्य के चरित्र की कायरतापूर्ण अभिव्यक्ति है। लोभ का अर्थ है, जो वस्तु आपकी नहीं है, उसे प्राप्त करने का प्रयास करना। इस संसार में अनेक वस्तुएं हैं, उनमें से कुछ हमारे पास हैं कुछ दूसरों के पास हैं।

अगर प्रत्येक व्यक्ति यह प्रयास करे कि सभी वस्तुएं उसी के पास हो जाएं तो यह संभव नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पूरा संसार किसी एक व्यक्ति का तो हो नहीं सकता और जो आपके पास नहीं है,

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अगर आप उसे कायरतापूर्ण ढंग से प्राप्त करना चाहते हैं तो लोभ के कारण आपका चरित्र नीचे गिरता है। लोभ मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास का बहुत बड़ा अवरोधक है।

लोभी व्यक्ति कभी भी स्वाभिमानी नहीं हो सकता। लोभी का स्वाभिमान होता ही नहीं, क्योंकि मांगना ही लोभ है, जो व्यक्ति किसी से कुछ भी मांगता हो, तो वह व्यक्ति कभी भी चरित्रवान नहीं हो सकता।

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मांगने वाला हमेशा छोटा होता है और जो स्वयं को छोटा मानता है वह कभी भी बड़ा नहीं हो सकता। अगर मनुष्य बड़ा बनना चाहता है, तो उसे लोभ को त्यागना होगा। लोभ का दमन मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं है।

साधना के क्षेत्र में लोभ के दमन के लिए संतोष का पाठ पढ़ाया जाता है, जो व्यक्ति संतोष से रहना सीख लेता है उसे कभी किसी से कुछ भी मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। जब एक बार जीवन में संतोष आ जाए तो उसके मन में लोभ कभी जन्म नहीं ले सकता।

लोभ एक ऐसी कामना है, जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो पाती। लोभ से तृप्ति नहीं होती। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रकार काम से काम की पूर्ति नहीं होती, उसी प्रकार लोभ की लोभी से पूर्ति नहीं होती।

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