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एक स्टेशन मास्टर बना था विवेकानंद का पहला शिष्य

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Aug 9 2017 9:03AM IST
एक स्टेशन मास्टर बना था विवेकानंद का पहला शिष्य

विवेकानंद जी विद्वान होने के साथ ही साथ छुआछूत और जात-पात को नहीं मानते थे। इतनी ख्याति पाने के बावजूद वे सरल स्वभाव के व पूर्ण रूप से सन्यासी का जीवन बिताते रहे।

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बात सन् 1886 की है। यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद हाथरस स्टेशन पर उतरे। वहां उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। हाथरस के स्टेशन मास्टर सुरेंद्र गुप्ता ने स्वामीजी को अपने घर ले जाकर सेवा की और उनसे इतने प्रभावित हुए कि स्वयं भी संन्यास लेने की इच्छा प्रकट कर दी।

स्वामीजी ने शर्त रखी, 'क्या तुम ये मेरी झोली उठाकर अपने कुली और खलासी आदि से भिक्षा मांग सकते हो।' स्टेशन मास्टर ने झोली उठाई। स्टेशन पर ही लोगों से भीख मांगी और स्वामीजी को अर्पित की।

ये ही सुरेंद्र गुप्ता स्वामीजी के पहले शिष्य हुए। हाथरस से पैदल जाते हुए रास्ते में उन्हें एक मैला-कुचैला व्यक्ति खाना खाते दिखा, उसके पास ही उसके लोटे और गिलास में पानी रखा हुआ था।

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स्वामीजी उसके पास गए और उससे पीने के लिए पानी मांगा। वह व्यक्ति पीछे हट गया और बोला, 'मैं निम्न जाति का हूं और सफाई का काम करता हूं। मैं आपको पानी नहीं दे सकता।'

स्वामीजी वहां से चल दिए। कुछ दूर जाकर वापस पलटकर आए और उस व्यक्ति से पानी लेकर पीया और मन में सोचा, मैं तो संन्यासी हूं। मुझे इस प्रकार के भेदभाव से ऊंचा उठाना चाहिए।'

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-Tags:#Swami Vivekananda#Spritual Story#Life
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