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जानिए, पूजा में क्यों जलाते हैं धूप और करते हैं आरती

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jul 22 2017 12:06PM IST
जानिए, पूजा में क्यों जलाते हैं धूप और करते हैं आरती

आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी कहते हैं कि भगवान की बनाई सृष्टि का हमेशा सम्मान करो। एक पेड़ को भी सम्मान के साथ देखो। पेड़ के अस्तित्व के लिए कृतज्ञ रहो।

वह हमारी सांसों द्वारा निकले जहर को लेकर वायु को शुद्ध करता है। क्या आपने ऐसा कभी सोचा है कि पेड़ आपके हैं? अगर सृष्टि का सम्मान करेंगे तो यह अनुभव करेंगे कि यह सभी आपके हैं। सम्मान करना दिव्य प्रेम का लक्षण है। इसी सम्मान को पूजा कहते हैं।

पूजा से भक्ति पनपती है, जो कुछ प्रकृति हमारे लिए करती है, उसी की नकल हम पूजा की विधि में करते हैं। परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में हमारी पूजा कर रहा है। हम पूजा द्वारा वह सब ईश्वर को वापस अर्पित करते हैं।

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पूजा में जो फूल चढ़ाए जाते हैं, वह फूल प्रेम के प्रतीक हैं। ईश्वर हमसे प्रेम करने अलग-अलग रूपों में आते हैं- माता-पिता, पति-पत्नी, मित्र, बच्चे आदि अनेक रूपों में। वही प्रेम गुरु के रूप में आकर हमें परमात्मस्वरूप तक पहुंचाता है जो कि हमारा सच्चा स्वभाव है।

परमात्मा हमें हरेक मौसम में तरह-तरह के फल देते हैं, हम फलों को उन्हें अर्पित करते हैं। प्रकृति हमें भोजन देती है, हम बदले में भगवान को अनाज चढ़ाते हैं। इसी तरह प्रकृति में चांद व सूरज रोज उदय और अस्त होकर हमें लगातार प्रकाश देते हैं।

उसी की नकल करके हम कपूर व दीपक की आरती करते हैं। सुगंध के लिए धूप जलाते हैं। पूजा में पांचों इंद्रियों का पूरे भाव से प्रयोग करते हैं। पूर्ण कृतज्ञता और सम्मान भाव ही अर्चना है।

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आप ने बच्चों को देखा होगा कि वह अपने छोटे-छोटे बर्तनों से खेलते हैं और चाय व रोटी बनाते हैं। मां के पास आकर बोलते हैं, 'मां आप चाय पीजिए' वह खाली कप से भी ऐसे कल्पना करते हैं जैसे सचमुच चाय पी रहे हैं।

वह आपके साथ खेल खेलते हैं। जैसा आप उनके साथ करते हैं, वह भी वैसा ही आपके साथ करते हैं। वह गुड़िया को सुलाते हैं, खाना खिलाते हैं, नहलाते हैं। ऐसे ही, पूजा में हम ईश्वर के साथ वही करते हैं जो ईश्वर हमारे साथ कर रहा है।

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