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क्या आपके घर में भी रखा है सोना, तो जानिए भगवद्गीता में लिखी ये बात

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jul 29 2017 10:13AM IST
क्या आपके घर में भी रखा है सोना, तो जानिए भगवद्गीता में लिखी ये बात

माया का खेल निराला है। सत्य और माया दोनों के संयोग से यह संसार चलता है। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा है कि यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित है। समस्त भूत उसके संकल्प के आधार पर निर्मित है पर वह स्वयं किसी में नहीं है।

माया का सिद्धांत इससे अलग है। वह स्वयं कोई पदार्थ नहीं बनाती है। वह सभी में स्थित भी दिखती है पर किसी भी भूत को प्राणवान नहीं बनाती।

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धन, सोना, हीरा, जवाहरात तथा वस्तु विनिमय के लिए निर्मित सभी पदार्थ माया की पहचान कराते हैं पर उनमें प्राणवायु प्रवाहित नहीं होती है। इसके बावजूद मनुष्य उसी के पीछे भागता है।

इस संसार में पेड़, पौधे, नदियां, झीलें तथा फूलों में सौंदर्य और सुगंध है पर उसकी वनिस्पत मनुष्य माया के प्राणहीन स्वरूप पर ही फिदा रहता है। अब तो सभी का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना है।

पूरे विश्व में धर्म के नाम पर बड़े-बड़े संगठन बन गए हैं। सीधी बात कहें तो धर्म आचरण से अधिक राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव बढ़ाने वाला साधन बन गया है।

सद्भाव से कर्म करने वाले को धन सामान्य मात्रा में मिलता है, जबकि कलेश करने और कराने वालों को भारी आय होती है। कहा जाता है कि संतोषी सदा सुखी।

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पर जब पर्दे पर महानायकत्व प्राप्त कर चुके लोग संतुष्ट न बनो और अपनी प्यास बढ़ाओ जैसे जुमले सुनाकर समाज की नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रहे हों, तब यह संभव नहीं है कि समाज को उचित मार्ग पर ले जाया जाए।

फिर भी जिनकी आध्यात्मिक ज्ञान में रुचि है उन्हें यह समझना चाहिए कि संसार में कलेश से प्राप्त धन कभी सुख नहीं दे सकता। इसलिए अपनी रोजी-रोटी के साधनों के रूप में सदैव सात्विक स्थानों पर जाने के साथ ही अपनी भावना भी शुद्ध रखनी चाहिए।

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-Tags:#Bhagavad Gita#Bhagavad Gita#Sri Krishna
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