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कुर्बानी की कहानीः अगर ऐसा न होता तो देनी पड़ी बेटे की कुर्बानी

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Sep 2 2017 10:38AM IST
कुर्बानी की कहानीः अगर ऐसा न होता तो देनी पड़ी बेटे की कुर्बानी

इस्लाम धर्म के मानने वाले लोग मुख्य रूप से दो ईद मनाते हैं। एक जो कि रमजान के बाद ईद-उल-फितर के रूप में मनाई जाती है। दूसरा ईद-उल-फितर के 70 दिन बाद ईद-उल-जोहा के रूप में मनाई जाती है।

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बकरीद किसको कि ईद-उल-अज़हा के नाम से भी जानते हैं, इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा कर बकरों की कुर्बानी देते हैं। दरअसल इस्लाम की मन्यता के अनुसार दुनियां में तकरीबन 1 लाख 24 हजार पैगम्बर यानि अल्लाह के दूत आए। 

इनमे से एक पैगम्बर मुहम्मद इब्राहिम हुए, ऐसा माना जाता है कि इन्ही के जमाने में बकरों के कुर्बानी की शुरुआत हुई। एक दिन अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम से सपने में उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। हज़रत इब्राहिम को सबसे प्रिय अपना बेटा लगता था। 

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उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का निर्णय किया। लेकिन जैसे ही हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे की बलि लेने के लिए उसकी गर्दन पर वार किया। अल्लाह चाकू की वार से हज़रत इब्राहिम के पुत्र को बचाकर एक बकरे की कुर्बानी दिलवा दी। जिसके बाद से कुर्बानी के रूप में बकरों की ही कुर्बानी दी जाती है।   

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in the time of muhammad ibrahim the sacrifice of goats was started

-Tags:#Islam Religion#Ramzan#Eid-Ul-Fitr#Kurbani#Muhammad Ibrahim#Eid Mubarak Bakrid 2017#
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