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मोहर्रम जानिए इस्लाम में क्या है इसका अर्थ, क्यों कहते हैं हिजरी वर्ष का पहला महीना

फैयाज अहमद | UPDATED Sep 26 2017 6:27PM IST
मोहर्रम जानिए इस्लाम में क्या है इसका अर्थ, क्यों कहते हैं हिजरी वर्ष का पहला महीना

दुनिया के सारे कैलेन्डर नये साल के साथ ख़ुशियों से भरा पैग़ाम ले कर आते हैं। लेकिन सिर्फ़ एक इस्लामी कैलेन्डर ऐसा है जो नये साल के साथ ग़म का पैग़ाम ले कर आता है। यह गम वो गम है जो सोते हुए इन्सान को झिंझोड़ता है।

मज़लूमों के अंदर उम्मीद की किरण पैदा करता है और ज़ालिम के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का हौसला देता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहौ अलैही वसल्लम ने इस महीने को अल्लाह का महीना कहा है। 

मोहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना है जो चाँद के हिसाब से चलता है। जिसे हिजरी साल भी कहा जाता हैं, आज से तक़रीबन 1400 साल पहले की बात है, सन् 61 हिजरी के मोहर्रम का महीना था।

जब हज़रत मुहम्मद (स) के नवासे, इमाम हुसैन (अ) को उनके 72 साथियों के साथ बहुत बेदर्दी से कर्बला, इराक़ के बयाबान में, ज़ालिम यज़ीदी फ़ौज ने शहीद कर दिया था।

यज़ीद एक ज़ालिम बादशाह था। उसकी हुकूमत सिर्फ़ अरब देशों पर ही नहीं थी बल्कि ईरान, इराक़, यमन, के कुछ हिस्सों पर भी थी। उस समय इस बादशाह को उस जमाने का सुपर पावर कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

यज़ीद ज़ालिम बादशाह मज़हब के नाम पर बुरी बातें फैलाना चाहता था। और अपनी अय्याशी और ज़ुल्म व सितम को इस्लाम का नाम देना चाहता था। 

ज़ालिम बादशाह को मालूम था कि वह अपने इस इरादे में तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक हज़रत मुहम्मद (स) के नवासे इमाम हुसैन (अ) का समर्थन ना मिल जाए। यही सोचकर यज़ीद ने हुक्म दिया कि इमाम हुसैन (अ) से समर्थन लिया जाए और अगर वह इनकार करें तो उन्हें क़त्ल कर दिया जाये। 

यज़ीद के खिलाफ कोई भी खड़े होने की हिम्मत नहीं कर रहा था। ऐसे में इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ उठ खड़े हुए और यज़ीद को अपने नाजायज़ मक़सद में कामियाब नहीं होने दिया।

मिटाने जुल्मों सितम का गुरूर निकलेगा और घटा को चीरकर सूरज जरूर निकलेगा।

और जहां रखती थी हजरे हुसैन ने अपनी पेशानी उसी ज़मी के ज़र्रों से एक नूर निकलेगा।

यज़ीदी फौजों ने इमाम हुसैन (अ) के छोटे से कारवान को जिसमे बूढ़े, औरते और बच्चे भी शामिल थे, उन्हें कर्बला के बियाबान में घेर लिया था। ज़ालिम यज़ीदियों ने उनका पानी तक बंद कर दिया था।

यज़ीद की बस एक ही शर्त थी, मज़हब के नाम पर उसकी नाजायज़ ख्वाहिशात के सामने अपना सर झुका दो नहीं तो शहादत के लिए तैयार हो जाओ।

इमाम हुसैन (अ) के साथियों ने उनका साथ दिया और यज़ीदी फौज के सामने डटकर खड़े हो गए। इमाम हुसैन (अ) और उन के साथियों ने शहादत को गले लगा लिया।

यहाँ तक कि 10 मुहर्रम को जिसे आशूरा भी कहते हैं। उसने सिर्फ़ नौजवानों को ही शहीद नहीं किया बल्कि बूढ़ों को भी शहीद किया। यहाँ तक कि 6 महीने के बच्चे अली असगर को भी अपने बाप की गोद में तीर का निशाना बनाकर शहीद कर दिया था।

जंग के खत्म होने के बाद यज़ीदी फ़ौज ने औरतों, बच्चों को कैदी बना कर यज़ीद के पास शाम भेज दिया था। जहाँ उन्हें क़ैदखाने कैद करके उनपर बहुत जुल्म किया गया था। लेकिन कैदियों ने तमाम सख्तियों के बावजूद हार नहीं मानी और इमाम का संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचाया। 

मोहर्रम सिर्फ़ एक महीने का नाम नहीं है बल्कि आज मोहर्रम नाम है एक आंदोलन का, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन, ना इन्साफ़ी के खिलाफ़ आंदोलन का, बुराइयों के खिलाफ आंदोलन का।

इमाम हुसैन (अ) की यह क़ुर्बानी नाइन्साफ़ी को ख़त्म करने के लिए थी। इसी लिए हर साल मुहर्रम में इस क़ुर्बानी की याद सिर्फ मुसलमान ही नहीं मनाते बल्कि हर वो इन्सान मनाता है जो इन्साफ़ पसन्द है। 

जब कभी हम दुनिया में आतंकवाद, भ्रष्टाचार और ज़ुल्म देखें और अपने आप को अकेला महसूस करें तो कर्बला के पैग़ाम को याद करें। जो हमे याद दिलाता है की अगर ज़ुल्म के खिलाफ़ मुकाबले में अकेले हो या तादाद में कम हो तो थक कर घर में न बैठ जाना।

सच्चाई की राह में अगर कदम आगे बढ़ाओगे तो याद रखो की जीत हमेशा सच्चाई की ही होगी। फिर चाहे उस सच्चाई के लिए तुम्हें अपनी जान क्यों न देनी पड़े।

आज भी इतिहास गवाह है कि ज़ालिम यज़ीद सारे ज़ुल्म करने के बाद भी अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो सका और हार गया, लेकिन इमाम हुसैन (अ) जान दे के भी जीत गए। क्योंकि वो ज़ुल्म के आगे नहीं झुके और इन्सानियत को बचा लिया।

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-Tags:#Muharram#Muslim#Imam Hussein
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