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बकरीद 2017: जानिए अल्लाह को क्यों प्यारी है कुर्बानी

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Sep 2 2017 10:42AM IST
बकरीद 2017: जानिए अल्लाह को क्यों प्यारी है कुर्बानी

भारत में जो पर्व आज बकरीद के नाम से जाना जाता है दरअसल वो ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-जुहा है। अज़हा अथवा जुहा का अर्थ है सुबह का वक्त यानी सूरज उगने से लेकर सूरज डूबने के बीच का वक्त।

यह पर्व अरबी महीने जिलहिज्जा की दसवीं तारीख को मनाई जाती है। इसी महीने में मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं। यूं तो कुर्बानी के लिए चौपाया जानवर कुर्बान करने की परंपरा रही है। लेकिन भारत में इसे बकरे से जोड़ कर देखा गया है इसलिए इस पर्व को बकरीद भी कहा जाता है।
 मुसलमानों को बकरीद के त्योहार में अपनी औकाद के मुताबिक किसी जानवर की कुर्बानी देने की परंपरा रही है। आज भी पूरे विश्व के मुसलमान हैसियत के मुताबिक हलाल जानवर खरीदते हैं और अपने रब की खुशी के लिए उसको कुर्बान करते हैं।
 
कुर्बानी का मकसद ये कतई नहीं है कि अल्लाह को खून या गोश्त पसंद है या उसे इसकी जरूरत है। बल्कि इसका मकसद ये है कि हर इंसान अपने जान-माल को अपने रब की अमानत समझे और उसकी खुशी के लिए किसी भी बलिदान के लिए तैयार रहे।
बकरीद में कुर्बानी तो जानवर की होती है लेकिन इससे जो हमें सीख मिलता है उसको समझने की जरुरत है। इस पर्व का एक संदेश यह भी है कि हमें अपने चरित्र को पाक-साफ रखना चाहिए। दिल को साफ रखें और दुनिया को एक बेहतरीन जगह बनाएं।
 
किसी भी पर्व के पीछे उसका इतिहास होता है, उससे जुड़ी मान्यताएं होती हैं और सामाजिक सरोकार होते हैं। कुर्बानी का पर्व बकरीद का मकसद भी सामाजिक एकता, आपसी भाईचारा, एक-दूसरे की जरूरत और किसी भी कठिनाई के समय अपना सबकुछ क़ुर्बान करने की भावना को बनाए रखना है। 
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